Sunday, December 4, 2016

संसद में बज रहे ढोल की पोल

 संसद के शीतकालीन सत्र में गतिरोध जारी है। 13 दिन गुजर गए लेकिन काम-धंधा शुरू होने की कोई ख़ुशखबरी अभी तक नहीं मिली है। मलाल तो हो रहा होगा लेकिन कोई बात नहीं! संसद के सत्र तो आगे भी आते रहेंगे। काम-धाम की तब देखी जाएगी। इसलिए हैरान-परेशान होने की जरूरत नही है! बस नज़रिया बदलने की जरूरत है! संसद में हो रहे हंगामे को हंगामा कतई नहीं समझा जाना चाहिए! इसे ढोल बजाना कहते हैं! 

ये ढोल विपक्ष बजा रहा है! इस ढोल की आवाज सनिए! ये ढोल इसलिए बजाया जाता है ताकि जनता जान सके कि अगर बैंक के सामने खड़े-खड़े जनता परेशान है तो संसद में उनके नेता भी कोई चैन से नहीं बैठे हैं। हंगामा, नारेबाज़ी, धरना प्रदर्शन इत्यादि-इत्यादि कितना कुछ करना पड़ता है। अपने कुछ बंदों को नियमित रूप से टीवी पर भेजना पड़ता है ताकि जनता को बताया जा सके कि ढोल उन्होंने ही बजाया था। ताकि जाना जा सके कि ढोल की आवाज जनता ने सुनी कि नहीं सुनी!  ये समझाया जा सके कि ढोल बजाना कितना जरूरी था। ढोल बजाने में किन-किन दलों और नेताओं ने साथ दिया! जो नेता सहयोग करने की बजाए कानों में उंगली डाल कर सत्ता पक्ष की साइड हो लिए उनको लताड़ना पड़ता है!

जनता को समझाना होता है कि आपको और हमें यानि प्रतिपक्ष को परेशान करने वाला दुश्मन एक ही है। लिहाजा आप हमारे साथ आ जाये। जिसने हमें परेशान किया है उसे सबक सिखाने के लिए जनता का हमारे साथ आना बहुत जरूरी है! मतलब अब गेंद जनता यानि आपके पाले में है। अब आप सोच रहे होंगे कि आप गेंद का क्या करेंगे! जिस गेंद का इस्तेमाल काफी बाद में होना हो उस गेंद की अभी क्या जरूरत!  आपकी बात में दम है लेकिन निराश होने की जरूरत नहीं है। मैं फिर कहूंगा कि आप नज़रिया बदलो। ढोल बजाने वाले नेताओं की योग्यता और क्षमता पर भरोसा  बनाए रखो। अपनी परेशानियां उनके हवाले कर दो। वे आपकी परेशानियों का सही इस्तेमाल करेंगे! आपकी परेशानियों को सीढ़ी बनाकर टॉप पर पहुंचेंगे! आपकी परेशानियों का इससे अच्छा उपयोग नहीं हो सकता है!

आप इसे इस तरह भी समझ सकते कि संसद भले ही नहीं चल रही हो लेकिन बाकी तो सब चल रहा है! और जो चल रहा है वो भी कम अभूतपूर्व नहीं है! इसे समझना पड़ेगा! जरा सोचिए! संसद चलने से देश का भला हो जाता और सत्ता पक्ष की धाक जम जाती! लेकिन प्रतिपक्ष को सांत्वना पुरस्कार के अलावा कुछ हासिल नहीं होता! अब भला इस बात को कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है! जब संसद चलने के लिए पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों ही बराबर के जिम्मेदार होते हैं तो फायदा भी तो दोनों को बराबर ही होना चाहिए न! मतलब महज संसद चलने से ही तो काम नहीं चलने वाला है न। इसलिए संसद चलने से जरूरी है सबकी राजनीति चले। लिहाजा राजनीति चल रही है। राहुल गांधी भी चल निकले हैं! राहुल का चलना कितना जरूरी था ये आप कांग्रेस से पूछ सकते हैं! वैसे क्या वाकई पूछने की जरूरत है?