Tuesday, November 22, 2016

विमुद्रीकरण और रेल दुर्घटना

दुखद और निराशाजनक
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विमुद्रीकरण के चलते लोगों की जान जाना बेहद दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है। हालांकि ज़िंदगी और मौत पर किसी का वश तो नहीं है लेकिन चूंकि ये मौतें एक ऐसी योजना के क्रियांवयन के दौरान हुई हैं या हो रही हैं जो सरकार की है। लिहाजा सरकार का फ़र्ज़ ही नहीं बल्कि नैतिक ज़िम्मेदारी भी है कि वो इन मौतों पर न केवल हार्दिक संवेदना व्यक्त करे बल्कि उनके पीड़ित परिजनों को उचित मुआवजा भी दे। केंद्र सरकार की तरफ़ से अभी तक ऐसी किसी पहल का नहीं होना बेहद दुखद और निराशाजनक है।


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राज्यसभा में पीएम के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक नारे लगाने वाले सांसदों ने साबित कर दिया है कि उन्हें न तो संसद की मर्यादा की ही कोई चिंता है और न ही जनता के दुखदर्द से उनका कोई लेना देना है! वरना सरकार का विरोध तो शालीन तरीके से भी किया जा सकता था। क्या आपत्तिजनक नारे लगाने से उस आम आदमी की परेशानी कुछ कम हुई जिसके नाम पर संसद में इतना हंगामा किया जा रहा है? नारेबाज़ सासंदों के ऐसे व्यवहार से सरकार के उस दावे को ही बल मिलता है जिसके मुताबिक केवल वही सियासी दल या नेता नोटबंदी से दुखी हैं जिनके पास काला धन है। विपक्ष की इस मांग में भी ज्यादा दम नहीं है कि बहस का जवाब पीएम ही दें। विमुद्रीकरण पर पूरा देश पीएम मोदी के विचारों से अवगत है इसलिए पीएम से ही जवाब मांगने की जिद पर अड़ना कितना सही है इस पर भी सोचा जाना चाहिए! इसके बजाए जो भी मंत्री सरकार की ओर से जवाब दे रहे हैं उनसे ही नोटबंदी योजना के क्रियांवयन में आ रही दिक्कतों पर सवाल किया जाना जनता के हक में होता। लेकिन दिक्कत ये है कि जनता तो एक बहाना भर है। असली मकसद तो कुछ और ही नज़र आता है।


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सुनो सरकार..

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इंदौर-पटना एक्सप्रेस रेल हादसे के पीड़ितों को मुआवजे का मरहम कोई राहत पहुंचाए या न पहुंचाए लेकिन अगर रेलवे सुरक्षा की खामियों की मरहम पट्टी कर इसे दुर्घटनामुक्त बना दिया जाए तो हर किसी को राहत मिलेगी। अक्सर होने वाली हृदय विदारक रेल दुर्घटनाओं को बर्दाश्त करना बेहद मुश्किल है सरकार। हादसे में असमय ही काल के गाल में समाने वाले लोगों की चीखें लंबे समय तक चैन से सोने नहीं देती। हंसते-खेलते, किलकारी मारते और मां की गोद में चैन से सोते हुए सफ़र कर रहे मासूमों का यूं हमेशा के लिए ख़ामोश हो जाना दिल तोड़ कर रख देता। इसे रोकिए सरकार। इसे रोकने के लिए जो कुछ भी बन पड़ता है उसे करिए। मगर करिए जरूर!

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विमुद्रीकरण(Demonetisation) के विरोध में तो कुछ नहीं कहना लेकिन कुछ घटनाएं ऐसे भी सामने आ रही हैं जिन्हें सुनकर मन विचलित हो जाता है, दिल बैठ जाता है। काले धन पर प्रहार होने की ख़ुशी तब काफ़ूर हो जाती है जब ये पता चलता है कि एक बैंक मैनेजर का ड्यूटी के दौरान ही काम के दबाव में हार्ट फेल हो गया या 9-10 दिन बाद भी लाइन में लगे बहुत से लोगो की शिक़ायत कि अभी भी उन्हें पैसा नहीं मिल रहा है जबकि उन्हें पैसे की सख़्त जरूरत है क्योंकि किसी की गर्भवती पत्नी को ख़ून चढ़ना है तो किसी का कोई अपना अस्तपताल में ज़िदगी और मौत के बीच झूल रहा है या कुछ और जरूरते हैं। कितने लोग तो दिन निकलने से पहले ही बैंक पहुंच जाते हैं। बावजूद इसके उन्हें निराशा ही हाथ लगती है। 'आज तक' चैनल पर देखा कि दिल्ली के एक बैंक मैनेजर की आंखों में उस वक्त आंसू आ जाते हैं जब एक कस्टमर उनके साथ बुरा बर्ताव करता है। मैनेजर के मुताबिक उसने पिछले साल ही कैंसर का ट्रीटमैंट लिया है और अभी दवाई जारी है। ज्यादा देर बैठने से दर्द भी होता है। मैंनेजर की हालत देखकर उससे वास्तव में सहानुभूति हो रही है। कहने को तो सरकार अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रही हो लेकिन ये कोशिश नाकाफ़ी लगती है। वहीं सरकार द्वारा किए जा रहे राहत के कुछ उपाय तो ऐसे हैं जिन्हें पहले भी किया जा सकता था।