Sunday, November 20, 2016

विमुद्रीकरण पर घिरी सरकार

अर्थव्यवस्था में जब काले धन और नकली मुद्रा की मात्रा बढ़ जाती है तो इससे निपटने का एक उपाय विमुद्रीकरण (Demonetization) है। काले धन के ख़िलाफ़ लड़ाई छेड़ते हुए पीएम मोदी ने 8 नवंबर 2016 की शाम को देश को संबोधित करते हुए 500 और 1000 के प्रचलित नोटों को बंद कर इनके स्थान पर नये नोट लाने की घोषणा की थी। इसे ही विमुद्रीकरण कहा जाता है। सरकार ने योजना के तहत पुराने नोटों को जमा करने या उनके बदले नये नोट लेने को लेकर विस्तृत कार्य योजना और 30 दिसंबर तक का समय निर्धारित किया है। हालांकि जो लोग किसी कारण 30 दिसंबर तक भी नोट जमा या बदल नहीं सके तो उन्हें 31 मार्च 2017 तक रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित केंद्रों पर पुराने नोट जमा कराने का मौक़ा मिलेगा।  


सरकार की इस घोषणा  से पूरा देश हैरान रह गया। हालांकि शुरुआत में लगभग सभी ने इसकी प्रशंसा करते हुए इसे साहसिक कदम बताया था। लेकिन योजना पर अमल के दौरान जब बैंकों के सामने लंबी-लंबी कतारें लगनी शुरू हुई तो सरकार की तैयारियों पर सवालिया निशान लगने लगे। बैंकों और एटीएम के सामने  कैश की किल्लत के चलते कतार में खड़े लोगों का धैर्य जवाब देने लगा। इस दौरान कुछ लोगों की जान भी चली गई। बैंक कर्मचारियों पर भी दबाव बढ़ गया जिसके चलते कुछ जगह से कुछ बैंककर्मियों की मौत होने की ख़बरें भी सुर्खियां बनी। क्रियांवयन पर पैनी नज़र बनाए रखते हुए सरकार लोगों को राहत देने के लिए कई उपायों की घोषणा भी लगातार कर रही है। जरुरत के हिसाब से रोज नये-नये दिशा निर्देश भी जारी कर रही है। इन दिशा निर्देशों का असर सामने भी आया है।


लेकिन बहुत से विशेषज्ञों की मानें तो ऐसा लगता है कि सरकार ने काले धन के ख़िलाफ लड़ाई छेड़ते वक़्त शायद पूरी तैयारी नहीं की थी। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा ग़रीब मजदरों व उन लोगों को भुगतना पड़ा है जिनके यहां या तो शादी है या जिनके परिजन ईलाज के लिए प्राइवेट अस्पतालों में भर्ती हैं।  ये सब नये नोटों की कमी से बेहाल है। मजूदरों को काम नहीं मिल रहा है क्योंकि आर्थिक गतिविधियां या तो लगभग ठप पड़ गई है या बेहद धीमी हो गई। विमुद्रीकरण की मार देश के अन्नदाता पर भी पड़ी है। किसान अपनी ख़रीफ की फसल को पैसे की कमी के चलते औने- पौने दामों पर बेचने को मजबूर हैं। रबी की बुआई का सीजन है लेकिन बीज खरीदने के लिए के लिए रुपये नहीं है। हालांकि सरकार ने बाद में किसानों को और शादी की तैयारी में जुटे परिवारों के लिए धन निकासी की सीमा बढ़ाकर कुछ राहत देने का प्रयास जरूर किया था। किसान एक सप्ताह में 50 हजार व शादी वाले परिवार शादी का कार्ड का दिखाकर ढाई लाख रुपये तक निकाल सकते हैं। लेकिन किसानों और शादी वाले परिवारों की शिक़ायत है कि बैंकों के सामने लंबी लंबी कतारों और बैंकों में कैश की कमी के चलते वे इस राहत का लाभ भी नहीं उठा पा रहे हैं। बीते शनिवार तक शहरों में हालात कुछ हद जरूर सुधरे हैं लेकिन ग्रामीण और दूर-दराज के क्षेत्रों में कैश की किल्लत अभी तक बनी हुई है।  


इस सभी बातों को लेकर पहले से ही विमुद्रीकरण की व्यवहारिकता पर सवाल उठा रहे विपक्ष ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया। बहुत से विशेषज्ञों ने भी विमुद्रीकरण के औचित्य पर ही सवाल उठाए हैं। पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने भी सरकार के इस फैसले को ग़लत बताया है। आलोचकों का कहना है कि इससे केवल गरीबों को ही परेशानी का सामना करना पड़ेगा। सोशल मीडिया पर भी ज़बरदस्त बहस छिड़ी हुई है। सरकार समर्थक लोग जहां इसे काले धन पर कड़ा प्रहार बता रहे हैं तो विरोधी और आलोचक इसकी जमकर आलोचना कर रहे हैं। दिल्ली के सीएम और आआपा के संयोजक अरविंद केजरीवाल तो इसे आज़ाद भारत का सबसे बड़ा घोटाला बता रहे हैं तो कांग्रेंस पार्टी योजना के क्रियांवयन को लेकर सवाल उठा रही है। कुलमिलाकर कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, बीएसपी और आआपा जैसे दल सरकार पर हमलावर हो गए। कुछ दलों ने तो सरकार से ये अपील भी की है कि वो इसे तत्काल रोक दे। विमुद्रीकरण को वापस लेने की मांग करने वालों में पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने बेहद उग्र रवैया अपनाया हुआ है। दोनों ही नेताओं ने इस योजना को वापस लेने के लिए न केवल अल्टीमेटम दिया है बल्कि ऐसा नहीं करने पर देशभर में आंदोलन और रैलियां करने के भी संकेत दिए हैं। बुधवार से शुरू हुए संसद के शीतकालीन सत्र के पहले तीन दिन भी इसी मुद्दे पर हंगामें की भेंट चढ़ चुके हैं। 


हालांकि सरकार ने ये साफ़ कर दिया है कि वो विमुद्रीकरण (मीडिया में इसे नोटबंदी भी कहा जा रहा है) का फ़ैसला वापस नहीं लेगी। सरकार फैसला वापस लेने की स्थिति में है भी नहीं। लिहाजा अच्छा ये होगा कि आगामी सप्ताह में और भी ज्यादा व्यवहारिक रवैया अपनाया जाए। साथ ही दूर-दराज के क्षेत्रों में नकदी संकट को दूर करने के उपाय तत्काल किए जाएं। क्रियांवयन को लेकर विपक्ष के आरोप बेजा नहीं हैं। सरकार का प्रयास होना चाहिए कि आरोपों पर तिलमिलाने की बजाय विपक्ष को सहयोग के लिए प्रेरित करे। वहीं विपक्ष को समझना चाहिए कि विमुद्रीकरण पर सरकार का पीछे हटना नामुमकिन है लिहाजा रचनात्मक सहयोग के लिए उसे भी आगे आना चाहिए।  





2 comments:

  1. परेशानियां बहुत आ रही हैं ये तो है ... सरकार कोशिश भी कर रही है पर जनता और सरकार के साथ पूरा विपक्ष साथ खड़ा नहीं नजर आ रहा ये ठीक नहीं ... सरकार को तेज़ी से कदम उठाने होंगे ...

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    1. वाकई आपने बिल्कुल ठीक कहा है। उम्मीद करनी चाहिए कि हालात जल्द से जल्द सामान्य होंगे।

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