Saturday, December 12, 2015

दंगे के आरोपी और मंत्री जी

मोदी सरकार में कृषि राज्यमंत्री संजीव बाल्यान, मुजफ्फरनगर दंगों के आरोपियों से जेल में जाकर मिले।  मंत्री महोदय के इस कदम से कुछ लोग जरूर हैरान होंगे। वैसे भी पहली नज़र में देखे तो संवैधानिक पद पर बैठे किसी भी व्यक्ति को ऐसा नहीं करना चाहिए। इससे समाज में गलत संदेश जाता है। जो समाज पहले से ही बंटा हुआ है उसके बीच की खाई और चोड़ी होती है।  मंत्री किसी समुदाय विशेष का नहीं बल्कि पूरे देश का होता है। लिहाजा उसकी जिम्मेदारियां भी बड़ी होती है जिनसे मुहं नहीं मोड़ा जा सकता।

लेकिन हमें इस खबर के दूसरे पहलू पर भी गौर करना होगा। आखिर क्या वजह हो सकती है कि कोई केंद्रीय मंत्री जेल जाकर, कथित तौर पर दंगा और बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों के आरोपियों से न केवल मिलता है बल्कि उनको हर संभव मदद देने का वादा भी करता है। इस खबर का यही वो पहलू है जिस पर हमें ध्यान देना होगा। पहलू ये है कि मुजफ्फरनगर दंगों में लोगों ने कई फर्जी मुकदमें भी दर्ज कराए थे। ये बात खुद उन लोगों ने स्वीकारी है जिन्होंने फर्जी मुकदमे दर्ज कराए थे। दुखद बात ये है कि फर्जी मुकदमें बड़े स्तर पर दर्ज कराए गए थे। किसी से आपसी रंजिश थी या कोई और विवाद था तो लोगों ने बदला लेने के लिए दंगों का आरोपी बना दिया था। दंगा प्रभावित इलाकों में आज भी कई लोग फर्जी मुकदमों में फंसे होने की बात कहते मिल जाएंगे। मंत्री महोदय जिन आरोपियों से मिले थे उनमें से गौरव नाम के आरोपी पर कथित तौर पर फर्जी मुकदमा दायर किया गया था। नीचे लिखे पैराग्राफ इंडिया टुडे की खबर से उठाया गया। पैराग्राफ में एक गौरव नाम के बंदे का जिक्र है जिसे आप खुद पढ़ सकते हैं। खबर का लिंक भी दिया है। क्लिक कर देख सकते हैं।

Among those falsely implicated are some youths between the age of 18 and 25. Raj Kumar Singh, a resident of Lank village, has submitted an application to the police that his son Gaurav, who has been selected provisionally as a soldier, was falsely implicated. The complainants were jealous of his son's achievement, he claimed.

(इस बात की केवल संभावना (पुष्टि नहीं) है कि मंत्री जी जिस गौरव से मिले उसी गौरव से जुड़ी खबर का पैराग्राफ व लिंक आपको दिया गया है।)  

(11 दिसंबर 2013)

पुलिस की मुसीबत बढ़ा सकती है फर्जी नामजदगी ( दैनिक जागरण) 20 सितंबर 2013
ये रहा लिंक..(इसे कॉपी कर एड्रेस बार में पेस्ट करें)
http://www.jagran.com/uttar-pradesh/muzaffarnagar-10738154.html

कई मामले ऐसे थे जिनमें वादी ने ही खुद  बताया कि उनके यहां कोई घटना नहीं हुई। कुछ मामलों में बयान गलत मिले और कई आरोपियों पर आरोप गलत मिले, ऐसे करीब 100 मामलों पर एक्सपंज रिपोर्ट लगाई गई है।  (दैनिक जागरण 7 सितंबर 2014)
ये रहा खबर का लिंक..(इसे कॉपी कर एड्रेस बार में पेस्ट करें)
http://www.jagran.com/uttar-pradesh/muzaffarnagar-11613048.html

मुजफ्फरनगर दंगों में फर्जी केस किस हद तक दर्ज हुए थे उसका अंदाजा आप अमर उजाला की एक खबर को पढ़कर लगा सकते हैं। ख़बर का लिंक भी साथ दिया गया है।

10 दिसंबर 2013, अमर उजाला

“मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान दर्ज कराए गए मुकदमों में बड़ी तादाद ऐसे लोगों की भी है, जिन्होंने महज गुस्से अथवा किसी के बहकावे में आकर फर्जी रिपोर्ट दर्ज करा दी।सोमवार को ऐसा ही मामला आईजी आशुतोष पांडेय के सामने आया, जब गांव बहावड़ी निवासी एक वृद्ध ने अपने तीन मुकदमों को फर्जी बताते हुए इन्हें खत्म करने की गुहार लगाई।

सोमवार को पुलिस लाइन में आईजी से मिलने पहुंचे गांव बहावड़ी निवासी अब्दुल रहमान ने फर्जी मुकदमे दर्ज कराने की जानकारी दी। अब्दुल रहमान का कहना था कि दंगे के दौरान वह परिवार समेत कैराना के राहत शिविर में रहने चला गया था।

वहां पहुंचकर गुस्से और लोगों के बहकावे में आकर उसने गांव बहावड़ी निवासी कई लोगों के खिलाफ फर्जी रिपोर्ट दर्ज करा दी। इसके साथ ही उसके बेटों नसीम और इसरार ने भी कई लोगों के खिलाफ फर्जी रिपोर्ट दर्ज करा दी, जबकि उनका दंगे में कोई नुकसान नहीं हुआ था।

अब्दुल रहमान ने आईजी से फर्जी मुकदमे दर्ज कराने के लिए माफी मांगते हुए इन मुकदमों को खत्म कराने की गुहार लगाई। अब्दुल रहमान का कहना है कि दंगों के बाद भले ही मामला शांत हो गया हो, लेकिन अब वह गांव लौटना नहीं चाहता।

आईजी ने एसआईटी के एएसपी मनोज कुमार झा को मामले की जांच कर फर्जी मुकदमे खत्म करने के निर्देश दिए हैं। 

वोटर लिस्ट देख किए गए नामजद

अब्दुल रहमान ने दंगे के मुकदमों में बड़े पैमाने पर की गई फर्जी नामजदगी की भी पोल खोली है। अब्दुल का कहना है कि उसने तो अपनी रिपोर्ट में गांव के केवल तीन लोगों के ही नाम दिए थे।

जिस शिविर में उसने शरण ली थी, वहां मौजूद कुछ लोगों ने उसे कंप्यूटर पर गांव बहावड़ी के लोगों की लिस्ट दिखाई और फिर उसमें से दस से अधिक लोगों को फर्जी तरीके से नामजद कर दिया गया।

वृद्ध का कहना था कि यही प्रक्रिया उसके बेटों द्वारा दर्ज कराए गए मुकदमों में भी अपनाई गई थी।” 


उपर्युक्त तथ्यों  को ध्यान में रखते हुए  ऐसा लगता है कि मंत्री महोदय को ये विश्वास है या दिलाया जा रहा है या  कि वो जिन आरोपियों से मिलने गए थे वे निर्दोष हैं। शायद यही वजह हो सकती है कि एक संवैधानिक पद पर आसीन होने के बावजूद भी मंत्री महोदय दंगे के आरोपियों से मिले। हमें, मंत्री के जेल जाकर आरोपियों से मिलने की खबर के इस पहलू पर भी नजर रखनी होगी क्योंकि अभी आरोप साबित नहीं हुए हैं लिहाजा उन्हें अपराधी भी नहीं माना जा सकता। हां अगर आरोप सिद्ध होते हैं तो मंत्री जी को फिर देश से माफी मांगनी होगी और अगर वो ऐसा नहीं करेंगे तो उनकी नीयत पर सवाल खड़े होंगे। लेकिन ये सब बात की बातें हैं

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