Thursday, March 19, 2015

वादा तेरा वादा


                                                       चित्र गुगल से साभार





कहते हैं वक्त बड़ी तेज़ी से बदलता है। अपना मानना है कि इंसान उससे भी ज्यादा तेजी से बदलता है और सियासी लोग सबसे जल्दी पलटी मारते हैं। चुनाव में जिस दल के खिलाफ चुनाव लड़ेगें, चुनाव बाद में उसी के साथ गठबंधन कर सरकार बना लेंगे। जिन वादों के दम पर ये चुनाव लड़कर आते हैं उन वादों की टर्म्स और कंडीशन्स यानि कि शर्तें चुनाव संपन्न होने के बाद जब जनता को पता चलती है तब महसूस होता है कि फिर उल्लू बन गए! शर्तें लागू थी! हाय ये पहले पता न चला! चुनाव के दौरान वादा करेंगे कि पूरे शहर में वाई-फाई फ्री मिलेगा लेकिन चुनाव बाद पता चलेगा कि वाई-फाई मिलेगा लेकिन शर्त ये है कि कम से कम एक साल बाद मिलेगा। इसके बाद अगर वाई-फाई मिला तो वो आधे घंटे तक तो फ्री मिलेगा इसके बाद चार्ज लगना शुरू हो जाएगा और हां! ये सुविधा भी केवल चुनिंदा जगहों पर ही मिलेगी यानि पूरे शहर में मिलेगी ऐसा स्वप्न में भी न सोचे! दूसरे वादों की भी शर्तें बाद में ही पता चलती है! शर्तें क्या जी, एक तरह से सत्ता में आते हीं राजनीतिक दल जनता के अरमानों पर पानी  सा फेर देते हैं और 24 घंटे पानी मिलने की गारंटी के बावजूद कुछ परिवारों के पास गर्मियों में पानी की एक-एक बूंद को तरसने के अलावा कोई चारा नहीं रह जाता है।

आम चुनाव 2014 में एक पार्टी ने दावा किया कि अगर विदेशों में जमा काला धन वापस आ जाए तो हर एक भारतवासी के खाते में लगभग 15 लाख रुपये आ सकते हैं। कुछ लोगों ने इस बात को ध्यान में रखकर उस पार्टी को वोट दिए। पार्टी जीत भी गई लेकिन किसी के खाते में 15 लाख तो दूर 15 पैसे तक भी न आए। इस पार्टी के पीएम ने लोगों से रेडियो के जरिए ‘मन की बात’ करनी शुरु कर दी लेकिन 15 लाख रुपये वाली काम की बात कभी न की! लोगों ने नाराज़गी जताई तो पता चला कि 15 लाख रुपये का दावा तो खाली चुनावी जुमला था। लोगों को ये जुमला पसंद आया या नहीं ये तो वही जाने लेकिन जो लोग 15 लाख की उम्मीद अब तक लगाए बैठे थे उनके दिल को भगवान शक्ति दे। उनका तो हो गया न 15 लाख का नुकसान जिसे बर्दाश्त करना आसान कतई न है! और भी बहुत से वादे थे। सबकी टर्म्स और कंडीशंस अब पता चल रही है। उल्लू बन जाने का अहसास बार-बार हो रहा है! 

ऐसा नहीं है कि केवल चुनाव के दौरान किए वादों से ही मुकरा जाता है। चुनाव बाद किए गए वादों-इरादों को भी अगले ही दिन भुला दिए जाता है! ज़रा याद कीजिए कि पराजित दल  कितनी मासूमियत से कहते हैं कि वो दिल से जनता के फैसले को मानेगें और विपक्ष में रहकर नई सरकार को पूरा सहयोग देगें! लोगों से जुड़े मुद्दे उठाते रहेगें। जनता के फैसले का सम्मान करेगें वगैरहा-वगैरहा। लेकिन  ज़रा ठहरिए! यहां भी शर्तें लागू हैं! वो आपको कभी पता नहीं चलेगी! इसलिए तो  पराजित दल कभी वो नहीं करते हैं जिसका दिलासा वो हारने के बाद जनता को दिलाते हैं? या करते हैं? वो बदला लेते हैं!  जनता से भी और जिसको वोट दिया उससे भी! बदला लेने के कई तरीके हैं! एक तरीका है कि वो जनता के हित के नाम पर सदन ही नहीं चलने दें! संसद में बहस  की बजाय वॉकआउट करेगें! बहस का थोड़ा फायदा होता है!  सभी राजनीतिक दल एक-दूसरे के पाखंड पर जमकर हंगामा करते हैं!  बवाल  काटते हैं। इसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों का ही महती योगदान होता है। हालांकि ज्यादातर मामलों में विपक्ष बेहद मुखर होता है। उसका रवैया उस  बच्चे के समान होता है जिसे कोई जरा सा छेड़ दे तो सारा घर सिर पर उठा लेता है!  ऐसे रवैये वाले विपक्ष को शांत रखने में उतनी ही सफलता मिलती है जितनी कुत्ते की दुम को सीधा करने में! बदला लेने के दूसरे तरीके भी हैं! वो आंदोलन करेगें, जुलूस निकालेगें! सड़क जाम कर जनता को इस बात की याद दिलाएंगे कि तुमने हमें वोट न देकर कितना बड़ा गुनाह कर लिया! एक तरह से अपना बेड़ा गर्क कर लिया है। आख़िरकार जनता को भी लगने लगता है कि इससे अच्छा तो इन्हें ही वोट दे देते!

 जब फिर चुनाव आएंगे सारे विपक्षी दल मुछों पर ताव लगाते हुए जनता  को बताएगें कि कैसे देश में बेरोजग़ारी बढ़ गई है, ना ये हुआ, ना वो हुआ! हाय! सत्ता में हम न हुए वरना चांद-तारे तोड़ लाते! इसलिए इस बार हमें वोट दो सारी समस्याएं दूर कर देगें! बिना टर्म्स और कंडीशंस बताए आसमान को जमीं पर उतार लाने तक के वादे करेगें!  जनता सब कुछ भूलकर इनकी बातों में आ जाएगी! ये सत्ता में आएंगे और जो सत्ता में थे वो बाहर जाएंगे उसी रोल को निभाने जो पहले विपक्ष निभा रहा था! चक्र ऐसे ही चलता रहेगा!  

1 comment:

  1. बहुत खूब, बहुत ही सार्थक लेख प्रस्‍तुत किया है आपने।

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