Tuesday, March 17, 2015

डर्टी पॉलिटिक्स अब और नहीं



हाल ही में रिलीज़ के.सी.बोकाडिया निर्देशित फिल्म ‘डर्टी पॉलिटिक्स’ पर दर्शकों का फैसला आ चुका है। नो मोर डर्टी पॉलिटिक्स कहते हुए दर्शकों ने निर्माता की उम्मीदों पर ऐसे पानी फेर दिया जैसे राहुल गांधी ने कांग्रेस के सपनों पर, मुफ्ती ने मोदी के भरोसे पर, बीजेपी ने अपने समर्थकों के उत्साह पर, केजरीवाल ऐंड कंपनी ने योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के अरमानों पर और बेमौसम बरसात ने किसानों के भविष्य पर! बॉक्स ऑफिस पर फिल्म औंधे मुंह गिरी है! गिरती भी क्यों न? टिकट खिड़की पर पर्स हल्का कर फिल्म संभालने वाले तो दर्शक हैं और दर्शक तो भैया पहले ही ना चाहते हुए भी डर्टी पॉलिटिक्स की ओवर डोज के शिकार हैं! फिल्म निर्माता तो बाकायदा पैसा लेकर ‘डर्टी पॉलिटिक्स’ दिखाना चाहते हैं! वाह भई वाह! जो डर्टी पॉलिटिक्स अखण्ड भारत के कोने-कोने में दिख जाती है, जिसके साइड इफैक्ट टोटल जानलेवा है उसे उठाने के लिए मेहनत की कमाई खर्च कर बॉक्स ऑफिस जाए?पागल कुत्ते ने काटा है क्या?  और अगर काटा भी हो तो ‘डर्टी पॉलिटिक्स’ देखने की बजाय इंजेक्शन ही न लगवा लें?

ये पब्लिक है निर्माता बाबू। सब जानती है! डर्टी पॉलिट्क्स तो बिल्कुल अच्छे से जानती है! इस डर्टी पॉलिटिक्स के चक्कर में भंवरी देवी की जान चली गई। कई ‘होनहार’ नेताओं का भविष्य अधर में लटक गया। कुछ नेताओं की कुर्सी चली गई तो कुछ को मिलते-मिलते रह गई। कई जेल में चक्की पीस रहे हैं तो कई अदलतों के चक्कर लगा रहे हैं। जो नेता बचे हैं वो जमकर डर्टी पॉलिटिक्स का तमाशा दिखा रहे हैं। आम जनता के हितों की आड़ में सबका उल्लू बना रहे हैं। इस हुनर में माहिर बंदे खाना भूल सकते लेकिन शैतानी चालें चलना नहीं! वैसे डर्टी पॉलिटिक्स दुधारी तलवार की तरह है। डर्टी पॉलिटिक्स का शो दिखाने वाले भी अक्सर इसका शिकार हो जाते हैं। ये बड़े या छोटे में भेद नहीं करती! जांत-पांत भी इसके एजेंडे से बाहर की सोच है। हालांकि इसका सबसे बड़ा शिकार तो खुद जनता होती है ख़ासकर निम्न मध्य वर्ग के लोग। आज़ादी के बाद से ही इस वर्ग का मूलभूत सुविधाओं के लिए तरसना आज भी ऐसे ही जारी है जैसे भिखारी का एक-एक पैसे को तरसना। डर्टी पॉलिटिक्स से कोई न बचा! 

अपनी अत्यधिक मीठी वाणी से ही शक्कर का काम चलाने वाले योगेंद्र यादव और एक ख़ास माइंडसेट वाले लोगों के हमदर्द प्रशांत भूषण डर्टी पॉलिटिक्स की चपेट में आ गए हैं! दोनों पर ही डर्टी पॉलिटिक्स के मंझे हुए खिलाड़ी होने के आरोप जड़े गए हैं। इनके इस ख़ास हुनर के चलते पार्टी प्रमुख और उनकी चौकड़ी की नींद हराम हो रखी है! हालांकि अपुन को दोनों के डर्टी पॉलिटिक्स के मंझे हुए खिलाड़ी होने पर पूरा शक़ है वरना ऐसी बेइज्जती न हुई होती? फिलहाल तो दोनों के कान पकड़कर आआपा से बाहर करने की खबरें उड़ रही हैं।

कुल मिलाकर जब ‘डर्टी पॉलिटिक्स’ के नाम से ही डर लगने लगे तो उसे देखने के लिए लोग पैसे क्यों खर्च करेंगे?  डर्टी पॉलिटिक्स इतनी व्यापक है कि सही कपड़े पहन फिल्म करने वाली हीरोइन मिल सकती है, राहुल गांधी का पता मिल सकता है, विदेशों से काला धन मिल सकता है, सच्चा और अच्छा नेता मिल सकता है लेकिन एक भी सार्वजनिक/निजी ऑफिस और क्षेत्र ऐसा नहीं मिल सकता जहां  डर्टी पॉलिटिक्स न मिले! जनता भी इससे इतनी आजिज आ चुकी है कि नाम सुनते ही भड़कने लगती है। डर्टी पॉलिटिक्स की कथा अथाह है अनंत है। इसलिए थोड़े को  ही बहुत समझना।  अब नो मोर डर्टी पॉलिटिक्स।

1 comment:

  1. डर्टी पॉलिटिक्स ........शानदार

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