Saturday, January 22, 2011

आखिर क्यों?

'दिल्ली मेट्रो' की.....
एक स्वागत योग्य शुरुआत.....
उन लोगों के लिए.....   
एक 'मुसीबत' बन गई है!
जो 'दूसरों के अधिकारों' की...
कभी परवाह नहीं करते!
ज़रा गौर कीजिए......
'महिला यात्रियों की' 
'परेशानियों को' ध्यान में रखते हुए....
 यह तय किया गया है..... 
कि अब 'दिल्ली मेट्रो' में.....
'पहला कॉच' केवल महिलाओं के लिए....
'आरक्षित' रहे!
ताकि वे यात्रा करते वक़्त.....
'सुरक्षित' रहें!
लेकिन इस व्यवस्था से भी.....
कुछ लोग व्यथित हैं!
उनके लिए 'महिला यात्रियों के प्रति'
'दिल्ली मेट्रो'  की ये शराफ़त....
एक तरह की आफ़त है!
वे यात्रा करते वक़्त.....
महिलाओं को एकटक ढेरने/घूरने
या उन्हें छेड़ने/ तंग करने  के .....
अपने 'जन्मसिद्ध अधिकारों' को लेकर
आशंकित हैं!
इसीलिए जानते हुए भी कि 'पहले कॉच' में....
सिर्फ़ 'महिला यात्रियों' का ही अधिकार है!
अक्सर वे 'महिला कॉच' में घुस जाते हैं!
और 'बेबस महिला यात्रियों' की....
सीटों पर जम जाते हैं!
सीट न मिलने की स्थिति में....
उनसे सटकर खड़े हो जाते हैं!
'जिद' ऐसी कि  जुर्माना भरना,
सबके सामने शर्मिंदा होना,
या पुलिस से पिटना तक मंजूर है!
लेकिन 'महिला यात्रियों के अधिकारों का'
'सम्मान' करना मंजूर नहीं! 
समाज में ऐसे बहुत से लोग हैं.....
जिन्हें दूसरों के अधिकार.... 
स्वीकार नहीं!
'गणतंत्र की ६१ वीं सालगिरह' के अवसर पर....
हमें ये भी विचार करना चाहिए!
कि हम केवल.......
'अपने अधिकारों' को ही याद रखते हैं!
लेकिन 'दूसरों के अधिकारों' को नहीं!
आखिर क्यों?











8 comments:

  1. 'अपने अधिकारों' को ही याद रखते हैं!
    लेकिन 'दूसरों के अधिकारों' को नहीं!
    आखिर क्यों?

    यही तो विचारणीय है..... बहुत अच्छी लगीं ये यथार्थ को प्रस्तुत करती पंक्तियाँ.......

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  2. बहुत सटीक बात को काव्य रूप दिया है आपने।

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  3. अच्छा सन्देश .

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  4. दिल्ली मेरी जान..क्या बात कही है.....आभार

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  5. aaapne to seedhe seedhe hi sach kah dala.......

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  6. log apne kertvo bhale na nibhate hai pr unhe apne adhikar yaad rehte hai

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  7. अच्छे विचार हैं आपके...शुभकामनायें !

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