Thursday, December 23, 2010

"मुन्नी की बदनामी" और "शीला की जवानी" का असर-

       पिछले दिनों अख़बारों  में  छपी  कुछ  ख़बरों ने मुझे आज की ये पोस्ट लिखने के लिए विवश कर दिया.  इन ख़बरों में  'मुन्नी' और 'शीला'  नाम की महिलाओं और लड़कियों की परेशानियों  का ज़िक्र था.  पूरा माज़रा कुछ इस तरह से है कि आजकल 'मुन्नी बदनाम हुई' और 'शीला की जवानी'  वाले गाने लोगों की जुबां  पर चढ़े हुए हैं.  पिछले काफ़ी समय से  लगभग हर जगह ये गाने बज रहे हैं. 

   
           ऐसे में 'शीला' और 'मुन्नी'  नाम की  महिलाएँ और लड़कियों को कई बार भारी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है. स्कूल, कॉलेज और  जहाँ कहीं भी 'शीला और मुन्नी'  नाम की कोई लड़की या महिला होती है,  उन्हें देखकर कभी उनकी सहेलियाँ तो कभी शरारती लड़के और कुछ पुरुष इन गानों को गाना शुरू कर देते हैं. ऐसा करने से उनपर क्या गुज़रती होगी इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं. पकिस्तान में एक 'मुन्नी'  नाम की महिला को इसी वजह से कई दिन तक अपनी दुकान बंद रखनी पड़ी. और बाद में भी  उसे अपनी दुकान में अपने स्थान पर मज़बूरन  किसी दूसरे को बैठाना पढ़ रहा है. मेरे एक परिचित  की बहन जिसका नाम शीला है पिछले कई दिनों से कॉलेज नहीं जा रही है. उसका कहना है की उसकी क्लास के लड़के और लड़की उसे बार-२  "शीला का ज़वानी" का गाना सुनकर चिढ़ाते है. आजकल वो किसी से फ़ोन पर बात तक नहीं करती है. दिल्ली के पास बसे  
नोएडा   शहर  में बात  यहाँ तक  आ पहुँची  कि कुछ महिला संगठनों ने इन गानों को रुकवाने के लिए ज़ोरदार प्रदर्शन किया. लेकिन उनको वांछित सफलता न हीं मिली और नहीं बड़े-2 मीडिया घरानों ने उनकी इस मांग को प्रमुखता से अपने समाचार माध्यमों में जगह दी.  मुझे पूरा यक़ीन है कि ऐसे प्रदर्शन कुछ और शहरों में भी ज़रूर हुए होंगे.

             ऐसे गाने लिखे जाने चाहिए या नहीं ये एक विवाद का विषय    हो सकता है लेकिन जब ऐसे गानों से किसी को परेशानी हो तो ऐसे गानों के बजने पर सवाल उठना लाज़मी है.  मेरा अपना ये मानना है कि फिल्मकारों और गीतकारों को और भी ज़्यादा  संवेदनशील होना चाहिए. मनुष्य की प्रकृति को हम सब भली भाँति जानते हैं. ऐसे में इस तरह के गानों को लिखते वक़्त, उन गानों के संभावित दुष्परिणामों को भी अपने ध्यान में रखना चाहिए.