Saturday, November 20, 2010

आपके तर्क, कुतर्क हैं ..........

         सबसे पहले तो मैं ये स्पष्ट कर दूँ कि ये लेख किसी धर्म विशेष के लोगों के संदर्भ में न होकर हर उस व्यक्ति के संदर्भ में हैं जो मांस भक्षण, धार्मिक कारणों से  कुर्बानी या वली के लिए जानवरों की हत्या करते हैं और उसे सही ठहराने के लिए तरह-२ कुतर्कों का इस्तेमाल तर्कों  के रूप में करते हैं. वो लोग किसी भी धर्म या समुदाय के हो सकते हैं.


          दूसरी बात,  मेरी नज़र में ऐसा करना एक बुराई है और इसके अलावा भी जो दूसरी बुराईयाँ हैं उन बुराईयों के प्रति भी मेरी कोई सहानुभूति नहीं है. इसलिए इस लेख से ये मतलब कतई न निकाला जाए कि दूसरी बुराई के ख़िलाफ़ नहीं लिखा केवल इसके ख़िलाफ़ क्यों लिखा? मेरी नज़र में बुराई, बुराई होती है. और हर बुराई के ख़िलाफ़ सभी को अपनी बात रखने का अधिकार है.
  
      पिछले दिनों  मांस भक्षण के कारणों से जानवरों की हत्या या धार्मिक कारणों से की जाने वाली वली/ कुर्बानी  के संदर्भ में लिखे कुछ ब्लोग्स के लेखों पर आई टिप्पड़ियों में कुछ ब्लोगर्स  ने बड़े अजीब तर्क दे-देकर उसे सही ठहराने की कोशिश की है. शाकाहारियों पर तो और भी ज़्यादा हत्या करने का आरोप लगाया है. उनके मुख्य तर्क कुछ इस  तरह से हैं .







1. क्या मृत शरीर के साथ करोड़ों जीवाणुओं का जला देना  हत्या नहीं है?
२. पेड़-पौधों की हत्या क्यों करते हों?
३. अनजाने में हमें हानि पहुचाने वाले लाखों कीड़े-मकोड़ों की हत्या की बात क्यों नहीं करते?
4. मेरे धर्म के लोगों के बारे में  ही क्यों, दूसरे धर्म के लोगों के बारे में क्यों नहीं?
५. वैज्ञानिक युग में भी कुर्बानी या वली का विरोध क्यों करते हैं?
६. दूसरी बुराइयों का ज़िक्र क्यों नहीं करते?
७. वैज्ञानिक जानवरों की हत्या करते हैं उसके बारे में क्यों नहीं लिखते हो?


पहली नज़र में ये सभी तर्क बड़े दमदार दिखाई देते हैं.
लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है?  आईये देखते हैं.   ज्ञानवान और   सर्वगुणसंपन ब्लोगर्स के इन तर्कों में कितना दम हैं !


पहला तर्क .........मांस भक्षण, धार्मिक कारणों से  कुर्बानी या वली के लिए जानवरों की हत्या करने वालों का कहना है  कि मरे हुए शरीर के साथ लाखों-करोड़ों  जीवाणुओं को जिंदा जला दिया जाता इसका दर्द तुम्हें क्यों नहीं होता?  इसे  तर्क कहें या कुतर्क इसका फैसला आप पर है.


     सबसे पहला  सवाल तो ये उठता है कि क्या जीवाणु और विषाणु को उसी श्रेणी  में रखा जा सकता है  जिस श्रेणी में इंसान या कुर्बान कर या वली चढ़ा  कर खाए जाने वाले जानवर को रखा जाता? क्या इनमें कोई अंतर नहीं हैं ? आपको  इसके लिए बहुत ज़्यादा दिमाग़ लगाने की ज़रुरत नहीं क्योंकि सच्चाई आप जानते हैं.  हक़ीक़त में तो जीवाणुओं और विषाणुओं  की तुलना उन जानवरों से की ही नहीं जा सकती जिनका ज़िक्र हम कर रहे है.  अंतर इतना अधिक है कि उनके बारे में चर्चा करना ही अपने ब्लॉग पाठकों का मूल्यवान समय ख़राब करना है. एक सुई की नोक पर करोड़ों-अरबों  जीवाणुओं और विषाणुओं को नंगी आँखों से देखना तक असंभव है. इनमे से कई  पृथ्वी पर वास करने वाले अपने से अरवों गुना बड़े जंतुओं के अस्तित्व के लिए खतरा है. जाहिर है कम से कम  मनुष्य जैसा चिंतनशील प्राणी अपने ऊपर मंडराते हुए इस ख़तरे से हर संभव बचेगा. ठीक वैसे ही जैसे मैं और आप बचते हैं.  जैसे कि बिना किसी वाजिब कारण के यदि कोई हमारे लिए ख़तरा बने तो हर वैध या अवैध तरीके से हम उस ख़तरे से बचने का प्रयास करते हैं.    

लेकिन  मांस भक्षण, धार्मिक कारणों से  कुर्बानी या वली के लिए जिन जानवरों की हत्या की जाती है उन  जानवरों से  मानवजाति को कौन सा ख़तरा उत्पन होता है. ये समझ से बाहर है.  
      
 फ़िर  भी  स्पष्ट करना चाहूँगा कि  इंसान के अंदर रहने वाले इन जीवाणुओं को इसलिए जलना पड़ता है क्यों कि ये मृत शरीर को छोड़कर नहीं जा पाते और न ही इन्हें व्यवाहरिक रूप से बाहर निकालना संभव है.   अगर  ये मृत शरीर से  अलग हो पाने में सक्षम होते तो लोग इनको पकड नहीं  जलाया करते कि भई आओ तुम्हें भी जलाना है. तुम्हें भी कुर्बान करना है या तुम्हारी भी वली चढ़ानी है.  भले ही ये हमारे लिए ख़तरनाक हैं.  मृत शरीर को ज़लाते वक़्त इन्हें ज़लाने कि भावना कतई नहीं होती बल्कि मृत के अंतिम संस्कार की भावना होती है.  ज़ाहिर है इस प्रक्रिया में मरने वाले जीवाणुओं की हत्या का सवाल ही पैदा नहीं होता.  फ़िर दर्द होने या  न होने का  सवाल ही नहीं उठता.  वयाव्हारिक द्रष्टि से इसे जीवाणुओं की हत्या कहना बेतुका है और कुछ भी नहीं. 

इनका दूसरा तर्क ...कि पेड़-पौधों कि हत्या क्यों करते हों? 


       पूछ सकता हूँ कि  आप पेड़ -पौधों की कुर्बानी या वली क्यों नहीं देते? या केवल उन्हीं का भक्षण क्यों नहीं करते ?  यक़ीन मानिए इसमें किसी को  कोई ऐतराज़ नहीं होगा.  लेकिन आप ऐसा कभी नहीं कर सकते क्योंकि आप पेड़ -पौधों और जानवरों में अंतर अच्छी तरह जानते हैं.  क्या ये सही नहीं है ? भई ...पेड़ पौधों और इन  जानवरों में धरती आसमान का अंतर है ये सारी दुनिया जानती है. अगर नहीं  होता  तो पेड़ों को काटने से भी खून बहा करता. फ़िर शायद पेड़ हत्या और पौधें हत्या जैसे शब्द आम होते जैसे कि जीव हत्या.  फ़िर  इनको भी कुर्बानी और वली के लिए इस्तेमाल  किया जाता. लेकिन नहीं की जाती क्योंकि अंतर है.   एक पेड़ से अगर एक टहनी तोड़ ली जाए या किसी पौधे की हरी-भरी पत्तियों को उस पौधे से  अलग कर दिया जाए तो नई टहनी और पत्तियां जल्द ही जा जाती हैं.  लेकिन अगर किसी बकरे की टांग तोड़ अलग कर दी जाए तो खून की धारा बह निकलती है. उसकी टांग कभी नहीं आती.  ये अन्तर तो सभी को पता है.  ज़ाहिर इस कुतर्क में भी कोई दम नहीं है. वैसे तो और भी अंतर हैं. लेकिन इतने ही काफ़ी हैं.


तीसरा तर्क .....कि अनजाने में हमें हानि पहुचाने वाले लाखों कीड़े-मकोड़ों की हत्या की बात क्यों नहीं करते?

       हत्या का सवाल ही पैदा नहीं होता.  जब भी हम सड़क पर चलते हैं तो कीड़ों-मकोड़ों का मारना या कुचलना हमारा उदेश्य कभी नहीं होता.  ये सब इंसान से अनजाने में ही मारे जाते हैं.  जिस वक़्त हमे ये अहसास हो जाता है कि हमारे पैर के नीचे कोई जीव है तो हम तुरंत अपना पैर उठा लेते हैं ताकि वह जीव बच सके.  अगर व्यवहारिक रूप से बिना किसी कीड़े -मकोड़े को मारे वगैर हम जी सकें तो ज़रूर जीना चाहिए . यहाँ पर ये बताना भी उल्लेखनीय  होगा कि जानबूझकर कीड़े मकोड़ों को मारना भी पाप है जब तक की उनसे आप के जीवन को कोई ख़तरा हो या आप इनकी हत्या से बच सकते थे लेकिन नहीं बचे. 

चौथा तर्क..... मेरे धर्म के लोगों के बारे में  ही क्यों, दूसरे धर्म के लोगों के बारे में क्यों नहीं?

  बिल्कुल बेकार और निराधार तर्क .........इस तरह की बुराई में जो लोग भी सम्मिलित हैं इस तरह के लेख  उन सबके लिए हैं न कि किसी धर्म विशेष के लोगों के लिए ही.  बुराई, बुराई होती हैं. इसका धर्म से लेना देना नहीं.  हमें बुराइयों का ज़िक्र धर्म के आधार पर नहीं करना चाहिए. मेरा ऐसा मानना है.   

५ वाँ तर्क....  वैज्ञानिक युग में भी कुर्बानी  या वली का विरोध क्यों करते हैं?

      भई ......एक तरफ़ तो आप वैज्ञानिक युग की बात करते हो दूसरी और धार्मिक कारणों से  कुर्बानी और वली चढाने  की बात का समर्थन  करते हो,  ये विरोधाभास क्यों ?  क्या आप ये नहीं जानते कि वैज्ञानिक सोच कुर्बानी और वली चढ़ाने  की घटनाओं का समर्थन नहीं करती.   मांस खाने से होने वाले फ़ायदों को लेकर वैज्ञानिक आज तक एक मत नहीं हैं . आए दिन शाकाहार के फ़ायदों का ज़िक्र भी उतना ही होता है जितना की मांसाहार के फ़ायदों  को लेकर.  ज़ाहिर है इस तर्क में भी कोई  दम नहीं है.
६ वाँ तर्क ........दूसरी बुराइयों का ज़िक्र क्यों नहीं करते?

       क्या इस तर्क को मांस भक्षण, धार्मिक कारणों से  कुर्बानी या वली के लिए जानवरों की हत्या को सही ठहराने के लिए प्रयोग किया जा सकता है.  आप ख़ुद फ़ैसला करें. मेरे हिसाब तो हरगिज़ नहीं .   भला ये भी कोई बात हुई. क्या आप चाहते हैं कि इस बुराई पर पर्दा पड़ जाए. आप देख सकते हैं  कि हम सब  अलग -बुराइयों  पर अपनी राय रखते हैं.  कुछ लोगों का विषय एक भी हो जाता है.  लेकिन ऐसा तो कभी नहीं कि केवल इसी बुराई पर चर्चा होती है.  आपके इस तर्क में कोई दम नहीं है .


७ वाँ तर्क..... वैज्ञानिक जानवरों की हत्या करते हैं उसके बारे में क्यों नहीं लिखते हो?
  
     सबसे पहले तो ये जान लो कि मांसभक्षण, जानवरों की कुर्बानी या वली चढ़ाने का  विरोध करने वालों ने इसे कहीं भी सही नहीं ठहराया.  इसलिए इस तर्क का उनका ख़िलाफ़ प्रयोग होना ही नहीं चाहिए.   

    दूसरी बात  वैज्ञानिक जानवरों की हत्या मानव समुदाय के व्यापक हित में  निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही  करते हैं. ऊपर से अक्सर उनका जानवरों को मारने का  तरीका भी कम दुखदाई होता है.  इसलिए वैज्ञानिकों पर जानवरों की हत्या का इल्ज़ाम डालना थोड़ा ज्यादयती  होगा.
              
          देश कि भलाई के लिए जैसे सैनिक शहीद होते हैं लेकिन उन पर फक्र किया जाता है. क्योकि वो सैनिक देश, समाज और लोगों के व्यापक हित में शहीद होते हैं.  ठीक वैसे ही मानवजाति के व्यापक हित  के कारण मरने वालों जानवरों को स्वीकार किया जा सकता है लेकिन केवल जीव के स्वाद और धार्मिक अंधविश्वासों के कारण जानवरों की हत्या को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता. मेरा ऐसा मानना है .


फ़िर भी अगर आपको ये ग़लत लगता है तो आप भी वैज्ञानिकों के  संदर्भ में लिख सकते हैं अपनी बात रख सकते हैं. लेकिन इस तर्क का उपयोग आप  मांसभक्षण, जानवरों की कुर्बानी या वली चढ़ाने का विरोध करने वालों के विरुद्ध करोगे तो एक तरह से उन्हीं की बातों  का समर्थन करोगे.


  मांस भक्षण के कारणों से जानवरों की हत्या या धार्मिक कारणों से की जाने वाली उनकी वली/ कुर्बानी को आप चाहे छोड़ दें या ज़ारी रखें,  आप के जैसे भी विचार हों मुझे कुछ नहीं कहना.
 लेकिन आपको इसे ग़लत मानने वालों के ख़िलाफ़ कुतर्कों का सहारा नहीं लेना चाहिए.   

      वैसे तो इन सभी (कु)तर्कों की काट में और भी तर्क हैं  चूँकि समझदार के लिए इतना ही काफ़ी  है इसलिए  मैं अपनी बात यहीं खत्म करता हूँ .


           अगर मेरी  बातों से किसी को ठेस लगी हो तो मुझे उसके लिए खेद है. क्योंकि मेरा मक़सद किसी  का दिल दुखाना तो कभी भी नहीं है . 
    
    आप मेरे तर्कों के समर्थन में या फ़िर विरोध में अपनी बात रखने के लिए स्वतंत्र हैं.