Wednesday, October 27, 2010

पापा.... मैं भैया से कम नहीं......

              राष्ट्रमंडल खेलों के सफ़लतापूर्वक सम्पन्न हो जाने के बाद आशानुरूप सभी लोग इन खेलों को लेकर अपने -२  मत व्यक्त  कर रहे  हैं.  इसमें कोई बुराई भी नहीं है  और इससे कई तथ्य भी सामने आ रहे हैं. ऐसे ही एक महत्वपूर्ण तथ्य पर मैं भी कुछ कहना  चाहता हूँ . बात कुछ इस तरह से है कि इन खेलों में पहले स्थान पर रहने वाले ऑस्ट्रेलिया के लिए सबसे ज़्यादा  पदक ऑस्ट्रेलिया की महिला खिलाड़ियों ने जीते हैं . चाहे वो सोने-चाँदी के पदक हों या कांस्य पदक.  तीनो ही वर्गों में महिलाओं ने बाज़ी मारी. जिसका मुख्य कारण ऑस्ट्रेलिया में महिला और पुरषों को बीच किसी भी स्तर पर कोई भी भेदभाव का न पाया जाना है. बराबर की जंग में ऑस्ट्रेलियन महिलाएँ वहाँ के पुरषों पर भारी पड़ी.




 भारत के लिए महिला खिलाड़ियों ने भले ही पुरुष खिलाड़ियों से कम पदक जीते हों..लेकिन पदक तालिका में भारत को दूसरे स्थान पर लाने का श्रेय महिला खिलाड़ियों को ही जाता है.  ये बात जग जाहिर है .


अगर भारत में भी सभी माता-पिता अपने बच्चों के साथ लिंग के आधार पर कोई भेदभाव न करें...ख़ासकर उनकी परवरिश में, और हर क्षेत्र में दोनो को बराबर का मौक़ा दें तो वो दिन दूर नहीं जब भारतीय महिलाएँ भी जीवन के हर क्षेत्र में भारतीय पुरषों को बराबर की टक्कर देंगी.  लेकिन वो दिन कब आएगा ये कोई नहीं जानता.


फ़िलहाल तो भारतीय परिवारों में अपने प्रति होने वाले  भेदभाव  को देख कर छोटी लडकियाँ शायद कुछ इस तरह से सोचती होंगी .........






मेरे लड़की होने पर करो कोई भी ग़म नहीं....
पापा ....मैं भैया से कम नहीं....
खूब  पढूँगी और लिखूँगी....
बाधाओं से नहीं रुकूँगी....
कभी किसी से नहीं डरूँगी....
जग में सबका नाम करूँगी....
अब कोई भी उलझन  नहीं....
पापा... मैं भैया से कम नहीं....
छोटी से ग़लती पर मुझे डांट....
और भैया को दुलार....
मुझको  सब रुलाते हैं....
लेकिन भैया को करते हैं प्यार....  
अब और करो ऐसा सितम नहीं....
पापा.... मैं भैया से कम नहीं....
मम्मी-दादी से भी जता दो....  
और एक बात मुझे बता दो....
जब लड़की-लड़का एक-समान....
और दोनो से ही है जग की शान....
फिर कन्या भूर्ण हत्यारों को आती क्यों शर्म नहीं?
पापा .... मैं भैया से कम नहीं....
मेरे लड़की होने पर करो कोई भी ग़म नहीं....
पापा ....मैं भैया से कम नहीं....