Tuesday, July 27, 2010

पत्नी..बोले तो प्रधानमंत्री जी ....



















अपनी नई बहू को समझाते हुए,
सासू माँ बोली............................
देखो बेटी, पति परमेश्वर होता है.
अपने पति का कहना मानना ही,
पत्नी का धर्म होता है . 
यह सुनते ही बहू  तपाक से बोली....
नहीं माँजी....
अब ऐसा कहाँ होता है ?
अब पति परमेश्वर नहीं,
बाकी सब होता है .  
बदली हुई परिस्तिथियों में,
पति का स्थान कुछ इस तरह से होता है.
जैसे  हमारा ये देश है,
वैसे ही  हमारा ये  घर है.
जिस तरह देका मालिक राष्ट्रपति होता है,
ठीक उसी तरह घर का मालिक पति होता है.
राष्ट्रपति केवल नाम का ही मालिक होता,
देश का असली कर्ता-धर्ता तो प्रधानमंत्री होता है.
जिसे सलाह देने के लिए उसका अपना,  
एक 'निज़ी मंत्रिमंडल' होता है,
और  कुछ दूसरे दलों का भी बाहरी समर्थन होता है.
चूँकि  वह बहुत ही शक्तिशाली होता है.
इसलिए जो उसे समर्थन नहीं देते हैं, 
प्रधानमंत्री उनके लिए तमाम मुश्किलें पैदा कर देता है .
इधर पति भी केवल नाम का ही मालिक होता है.
और घर में पत्नी का स्थान, 
भारत के प्रधानमंत्री की तरह ही होता है.
पत्नी को सलाह देने के लिए उसका भी अपना,
एक 'निज़ी मंत्रिमंडल' होता है.
जिसमें उसकी माँ का स्थान मुख्य होता है.
और साथ ही कुछ पारिवारिक सदस्यों के अलावा,
उसके रिश्तेदारों का भी बाहर से समर्थन होता है .
इस तरह पत्नी भी बहुत शक्तिशाली होती है.
पति के घर वालों पर भारी पड़ने वाली होती है.
और जो उसका समर्थन नहीं करते,
तो पत्नी उनका जीना हराम करने वाली होती है. 
जिस तरह प्रधानमंत्री की सलाह पर,
राष्ट्रपति को चलना होता है.
ठीक उसी तरह घर में पत्नी की सलाह पर ही,
पति को भी चलना पड़ता है.
हाँ..कभी -२ विशेष परिस्तिथियों में ,
भारतीय राष्ट्रपति की तरह ही,
घर में पति को भी पत्नी को न कहने का,
उसको किसी मसले पर पुनर्विचार करने का,
या उसकी माँगो में कुछ संशोधन के लिए कहने का,
या फिर उन पर कुछ समय तक,
कोई कार्यवाही न करने जैसे कुछ अधिकार हैं.
लेकिन ये केवल नाम के ही अधिकार हैं .
व्यवहारिक  द्रष्टि  से  बेकार हैं .
ज़्यादातर मामलों में राष्ट्रपति की तरह,
पति को भी अंत में सभी माँगों को मानना ही पड़ता है.
राष्ट्रपति और पति के अधिकारों में,
कुछ महत्वपूर्ण अंतर भी होते हैं.
जैसे राष्ट्रपति,
प्रधानमंत्री को पर्याप्त समर्थन के अभाव में,
तुरंत हटा देता है.
लेकिन घर में पति को ऐसा कोई अधिकार नहीं है. 
पत्नी को किसी का समर्थन न भी हो,
तब भी उससे पीछा छुड़ाना कतई आसान नहीं है, 
दूसरी बात प्रधानमंत्री को'  
राष्ट्रपति को पीटने या उसके सामने,
चिल्लाने का अधिकार नहीं है. 
लेकिन पत्नी के मामले में,
इस अधिकार को लेकर कुछ भ्रम की स्थिति है.
एक ओर जहाँ कुछ पत्नियाँ इस अधिकार का,
खुल्लम-खुल्ला  प्रयोग करती हैं .
तो वहीं दूसरी ओर कुछ पत्नियों को,
अपने पतियों को पीटने में घोर आपत्ति है.
लेकिन पतियों पर चिल्लाने के अधिकार का, 
वे भी भरपूर इस्तेमाल करती हैं .
माँजी.....इससे आगे बस इतना ही कहूँगी. 
कि अब मैं भी इस घर की प्रधानमंत्री बनकर,
अपने 'निज़ी मंत्रिमंडल' की ताक़त के दम पर,
अपना घर चलाऊँगी,
पति से जो चाहूँगी वही करवाऊँगी,
उसे अपनी उँगलियों पर नचाऊँगी.
हालाँकि इस घर को सही से चलाने के लिए,  
मुझे आपके समर्थन की ज़रुरत होगी,  
लेकिन माँजी बदले  में,
मैं आपकी कोई शर्त नहीं मान सकती हूँ . 
आप तो जानती ही हैं कि आपके समर्थन,
के बिना भी मैं ये घर चला सकती हूँ .
लेकिन आपके लिए अति कष्टकारी,  
मुश्किलें खड़ी कर सकती हूँ . 
इसलिए कोई भी निर्णय लेने से पहले,
अच्छी तरह सोच लेना,
वरना फिर बाद में मुझे दोष मत देना.
उम्मीद है कि अब आप समझ गई होंगी.
मैं तो बहुत थकी हुई हूँ ,
शायद आप भी थक गई होंगी.
इसलिए कृपया अब आप यहाँ से चली जाएँ,
और मेरे लिए एक कप चाय ज़रूर भिजवाएँ.  


विशेष:-  प्रिय ब्लॉग पाठकों...........ये केवल एक व्यंग रचना है.
              इसको सत्त्यता की कसौटी पर न परखें क्योंकि ये सभी   
              पत्नियों  के संदर्भ में सत्य नहीं हो सकती. 

                                            धन्यवाद