Wednesday, November 10, 2010

बंद करो ये हाहाकार !!!!!!

मत मचाओ कोई भी शोर!
और बंद करो ये हाहाकार!
आसमान तो नहीं टूट पड़ा!
ग़र फ़िर किसी ने थोड़ा सा माल लिया डकार!


भई बात है ये बिल्कुल ही सच्ची!
हराम की दौलत लगती है अच्छी!
ईमानदारी का राग अलापते जो!
अक्ल है उनकी बिल्कुल ही कच्ची!


वैसे भी हमाम में सब नंगे है!
ऊपर से चोरों को पकड़ने में भी बड़े पंगे हैं!
चोरी सिद्ध हुई तभी चोर, चोर है!
और अगर न हो सकी तो हर-हर गंगें है! 


इसीलिए हर तरफ़ है एक ही आवाज़!
माल उड़ाना यहाँ बन गया है रिवाज़!
अब हर तीसरा व्यक्ति हो गया है भ्रष्ट!
इतना बदल गया है भारतीय समाज!


ग़र चाहते हो भ्रष्टाचार मिट जाए! 
बेईमान अपने पदों से हट जाएँ! 
तो इससे पहले एक काम ये भी करें! 
कि हम सब अपने सोए ज़मीर को जगाएँ! 


फ़िर अपने लालच पर करें प्रहार!
न दें इसको तनिक भी आहार! 
वक़्त बदलते देर न लगेगी! 
जल्दी ही आएगी देश में ईमानदारी की बयार! 

16 comments:

  1. bhrishtachar par achhi kavita. Pahli baar apke blog par aaya hoon, sukhad laga.

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  2. वैसे भी हमाम में सब नंगे है!
    ऊपर से चोरों को पकड़ने में भी बड़े पंगे हैं!
    चोरी सिद्ध हुई तभी चोर, चोर है!
    और अगर न हो सकी तो हर-हर गंगें है!


    kya baat hai dost
    gager me sager
    bahut acchi kavita

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  3. ग़र चाहते हो भ्रष्टाचार मिट जाए!
    बेईमान अपने पदों से हट जाएँ!
    तो इससे पहले एक काम ये भी करें!
    कि हम सब अपने सोए ज़मीर को जगाएँ!

    फ़िर अपने लालच पर करें प्रहार!
    और न दें इसको बिल्कुल भी आहार!
    वक़्त बदलते देर न लगेगी!
    जल्दी ही आ जाएगी देश में ईमानदारी की बहार!

    व्यंग से शुरू हुई कविता climax पर पहुँच कर दिल को छू लेती है.
    बहुत बढ़िया

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  4. 3/10

    बरखुदार आपने बात तो कायदे की कही है एकदम सही.
    लेकिन तुकबंदी बहुत हल्की है
    थोड़ी कलात्मकता भी लाईये

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  5. भई बात है ये बिल्कुल ही सच्ची!
    हराम की दौलत लगती है अच्छी!
    ईमानदारी का राग अलापते जो!
    अक्ल है उनकी बिल्कुल ही कच्ची....
    कुछ ही हवा चल रही आजकल तो..... बढ़िया लिखा आपने

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  6. विरेन्द्र सिंह चौहान जी
    नमस्कार !
    सत्य ... बहुत ही यथार्थ लिखा है .
    वाह आपका एक रंग यह भी........ बढिया....

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  7. बेहद गहन प्रश्न और सभी निरुत्तर ……………बेह्तरीन रचना सोचने को मजबूर करती है।

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  8. वीरेंदर भाई,
    स्वाद आया!
    आखिरी पंक्तियों के लिए: इन्श'अल्लाह!
    आशीष
    ---
    पहला ख़ुमार और फिर उतरा बुखार!!!

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  9. ग़र चाहते हो भ्रष्टाचार मिट जाए!
    बेईमान अपने पदों से हट जाएँ!
    तो इससे पहले एक काम ये भी करें!
    कि हम सब अपने सोए ज़मीर को जगाएँ! ...

    bIlkul sahi farmaya aapne. apne jameer ko jagane ki jaroorat hai.

    .

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  10. very nicely written.....
    we can just hope for a better world!!

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  11. ख्याल तो नेक हैं .....

    सच्चाई का हर लफ्ज़ का खुद आइना बनता जायेगा
    तू चलता चल अकेला काफिला खुद बनता जायेगा ....

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  12. चोरी सिद्ध हुई तभी चोर, चोर है!
    और अगर न हो सकी तो हर-हर गंगें है!
    बहुत अच्छी लगी रचना हमे भी आशा है कि एक बार फिर से बदलेगा समाज का चेहरा
    फ़िर अपने लालच पर करें प्रहार!
    और न दें इसको बिल्कुल भी आहार!
    वक़्त बदलते देर न लगेगी!
    जल्दी ही आ जाएगी देश में ईमानदारी की बहार!
    शुभकामनायें।

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  13. शुरुआत स्वयं से ही की जा सकती है।

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  14. सहमत हूँ. कुमार साब.... मैंने तो बचपन से ही ऐसी शिक्षा पायी है कि बेईमानी के बारे में सोचना ही पाप लगता है . इस बात के लिए अपने माता पिता का शुक्रगुजार हूँ. जिन्होंने मुझे ऐसी शिक्षा दी.

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