Thursday, September 16, 2010

भगवान पर घोर अत्याचार !


हे भगवान् !
ऐसा क्यों होता है ?                            
जिसको ज़रुरत है...                       
उसे कुछ नहीं मिलता.
और जिसे ज़रुरत न हो...
उसको भरपूर मिलता है.
संसार भर में...
इसके अनगिनत उदहारण हैं.
प्रभु औरों की छोड़िए!
आप अपने आप को ही देखिए...
आप के साथ भी कुछ ऐसा ही है .
हे मेरे आराध्य !
वैसे तो ये सब माया ही आपकी है.
लेकिन कुछ समझते हैं...
कि ये उनके बाप की है.
हे परमपिता! आप सबसे बड़े दानी हैं.
दिन-रात आपकी सेवा में...
लगे संसार के बड़े-2 ज्ञानी हैं.
और हर समय आपसे कुछ न कुछ...
माँगने वाले मेरे जैसे अज्ञानी हैं.
हे मेरे प्रभु! आपकी शान में...
जो भी कहा जाए वो कम है.
आप रुपए-पैसों से खुश हो जाते हैं...
कुछ लोगों को ये भ्रम है.
इसलिए जो लोग ज़रूरतमंदों की...
सहायता करने से कतराते हैं.
परोपकार के कामों ...
और जीव सेवा से बचते हैं.
वो अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए...
आप के दरबार में आते हैं.
आपके चरणों में शीश नवाते हैं.
और बड़े प्रेम से आपको फल-फूल...
दूध -दही के साथ ...
रुपए-पैसे भी चढ़ाते हैं .
कुछ  तो  हीरों जड़ा...
सोने का मुकुट पहनाते हैं.
हे कृपालु ! वो हर प्रकार से...
आप पर धन लुटाते हैं.
वो समझते हैं कि उनके ऐसा करने से...
आप ख़ुश हो जाते हैं.
जिससे उनके सारे पाप...
पुण्य में बदल जाते हैं.
शायद वो आपको भी रिश्वतखोर...
और माल उड़ाऊ समझते हैं.
सच बताओ भगवान् ऐसा करने से... 
क्या आप वाकई में खुश होते हो ?
या फिर किसी ग़रीब...
असहाय, अपंग...
और किसी बेसहारा... 
की मदद करने वालों की बाट ..
आप भी जोहते हो.
अगर ये सत्य है तो...
मेरे मालिक! आप उन लोगों से...
ये क्यों नहीं कहते हो ?
कि आप तो केवल प्रेम के...
भक्ति के और भाव के भूखे हो.
जो दूसरों का दर्द समझे...
सभी जीवों से प्यार करें...
किसी पर किसी भी प्रकार से...
अत्याचार न करें...
आप के बताए रास्ते पर चले...
और हर प्रकार के पाप से बचते हुए...
हमेशा आपको याद  रक्खें...
ऐसा करने वाले मनुष्यों पर ... 
हमेशा अपनी कृपा बनाए रखते हो. 
हे मेरे नाथ ! धन-दौलत...
सोना-चाँदी और हीरे- जवाहरात... 
ये सब तो आपके लिए बेकार है.
आप को रिश्वतखोर समझना ही...
आप पर घोर अत्याचार है.
वास्तव में तो संसार के सभी जीवों से...
आपको बराबर प्यार है.
जीवों की सच्चे ह्रदय से सेवा करना मात्र ही...
आपके लिए बहुत बड़ा उपहार है.



15 comments:

  1. भगवान को भी इन भ्रष्टाचारियों ने भ्रष्टाचार का अंग बनाकर धरती छोड़ने को मजबूर कर दिया है और मंदिरों पर अब इन भ्रष्टाचारियों का ही कब्ज़ा है और मंदिर ट्रस्ट अरबपति है और देश की जनता भूखे मर रही है ... ये सब एक बहुत बड़े भ्रष्टाचार का खेल है ,आम इमानदार जनता को इससे बचना चाहिए और मंदिर मस्जिद की जगह असहाय और जरूरत मंद की सहायता करनी चाहिए ...उम्दा प्रेरक प्रस्तुती ...

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  2. बहुत अच्छी सोच के साथ लिखी कविता ...ईश्वर को पा लें तो फिर कुछ नहीं पाने को शेष रहता ..

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  3. बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

    मशीन अनुवाद का विस्तार!, “राजभाषा हिन्दी” पर रेखा श्रीवास्तव की प्रस्तुति, पधारें

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  4. इश्वर को पाने की चाह हर किसी की होती है पर अगर हमें इश्वर मिल जाए तो ज़िन्दगी में और किसी चीज़ की चाह नहीं रहेगी! बहुत ही गहरे भाव के साथ आपने अत्यंत सुन्दर रचना लिखा है जो प्रशंग्सनीय है! आपकी लेखनी को सलाम!

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  5. क्या बात है वीरू भाई. बहुत ही उम्दा सोच, उम्दा रचना. आभार.

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  6. आपने बिलकुल सही लिखा है विरेन्द्र जी , मेरा भी यही मानना है की हज़ारों-करोड़ों रूपये की धन और सामग्री को इस प्रकार से भगवान के नाम पर बेकार करने की बजाये उसे दीन-दुखियों की मदद में लगाया जाना चाहिए ,भगवान इससे खुश होता है ना की दिखावे से


    महक

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  7. बहुत अच्छी प्रस्तुति।

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  8. ....उम्दा प्रेरक प्रस्तुती

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  9. बहुत ही उम्दा सोच विरेन्द्र जी

    बहुत पसन्द आया
    हमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद
    बहुत देर से पहुँच पाया .........माफी चाहता हूँ..

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  10. truly said....logon ne 'bhagwaan' ko bhi commercialise kar diya hai....you included all the points....but it's good to see that nice and thoughtful people like you still exist in this world....

    you won't believe...i was about to write something like this only...infact written almost..

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  11. वाह! क्या बात है!

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  12. बहुत अच्छी प्रस्तुति
    बहुत ही उम्दा सोच

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  13. wah yaar apne to kmal ka likha h... jai ho upar wale ki

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