Saturday, April 22, 2017

नहीं चलेगा बहाना गर धरा को है बचाना




२२ अप्रैल को "विश्व पृथ्वी दिवस". के रूप में मनाते हैं. इस दिवस को मनाने का मक़सद लोगों को पृथ्वी पर मंडराते हुए ख़तरे के प्रति चेताना और उस ख़तरे को कम करने के बारे में जागरूक करना है. आज से चार दशक पहले एक अमेरिकी सीनेटर ने पर्यावरण के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए लाखों लोगों के साथ २२ अप्रैल , १९७० को एक विशाल प्रदर्शन किया था. इसी कारण इस दिन को पृथ्वी दिवस के रूप में मान्यता मिल गई. वैसे २१ मार्च को भी संयुक्त राष्ट्र संघ के समर्थन से अंतर्राष्ट्रीय पृथ्वी दिवस मनाया जाता है. जबकि अधिकाँश देशों में २२ अप्रैल को ये दिवस मनाया जाता है.





पृथ्वी पर मंडराते इस संकट का कारण केवल और केवल मनुष्य है. बड़ती हुई जनसँख्या पारिस्थितिकी संकट पैदा कर रही है. प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से पर्यावरण को घातक नुकसान पहुँचा है. ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से लेकर सुनामी जैसे भयानक तूफ़ान के लिए मनुष्य ही ज़िम्मेदार है. आर्कटिक ध्रुब पर 27 ग्लेशियर ही बचे हैं, जबकि 1990 में 150 थे।एक अनुमान के अनुसार बहुत जल्द विश्व की आधी जनसँख्या को पीने का शुद्ध पानी भी नहीं मिलेगा. धरती पर उपलब्ध कुल पानी का ९७% खारा है. ३% से भी कम पानी ताज़ा है जिस में से २.२४% बर्फ़ के रूप में ०.६% धरती के अंदर और बाकी बचा झीलों और नदियों वगैरह में है. इतने पर भी हम न तो पानी की बर्बादी पर ही ध्यान देते हैं और न ही जल संरक्षण के लिए कुछ ठोस उपाय करते हैं. आज दुनिया के करीब एक अरब लोगों को पेयजल नहीं मिलता। 2050 में करीब तीन अरब लोगों को पेयजल नहीं मिलेगा। देश में जल संकट बढ़ेगा। 2050 तक भारत के करीब 60 फीसदी भूजल स्रोत सूख चुके होंगे।



पृथ्वी और उसके पर्यावरण को बचाने के लिए विश्वभर में सभी लोग ज़्यादा से ज़्यादा पेड़ लगाएँ, पॉलीथीन का प्रयोग तुरंत बंद करें. प्राकृतिक संसाधनों और उनसे बने उत्पादों का सोच समझकर उपयोग करें. हम सभी सादगी और संयम से रहते हुए संतुलित खानपान अपनाएँ. पानी की हर बूँद कीमती है ऐसा सोचकर ही पानी का उपयोग करें और पानी को बचाने का हर संभव उपाय करें. इसके साथ-२ सभी देशों की सरकारें भी लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने व बचपन से ही पृकृति प्रेम को बढ़ावा देने के लिए ठोस उपाय करें तो निश्चित ही संसार का सबसे सुन्दर और अनमोल उपहार, हमारी प्यारी धरती माँ , आने वाले करोड़ों वर्षों तक हमें पालती रहेगी.






चलिए हम भी अभी से ये प्रण लें कि ऐसा कोई भी काम नहीं करेंगे जिससे धरती के पर्यावरण को कोई भी हानि हो साथ ही लोगों को स्वच्छ पर्यावरण के लाभ बताने के साथ-२ उनको पर्यावरण को सुरक्षित रखने के तौर-तरीक़े न केवल बताएँगे बल्कि पर्यावरण हितेषी बन अपना उदहारण भी उनके सामने रखेंगे। याद रखना होगा कि गर धरा को है बचाना तो अब नहीं चलेगा कोई बहाना। 

Friday, April 21, 2017

तमिलनाडु के किसानों का मार्मिक प्रदर्शन





दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहें तमिलनाडु के किसानों ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा है। पीएम मोदी तक अपनी बात पहुंचाने के लिए ये किसान अजीब तौर-तरीके अपना रहे हैं। प्रतिकात्मक रूप से कभी इंसानों की खोपड़ियों के कंकाल सामने रखकर बैठ जाते हैं तो कभी घास खाते हैं और कभी चूहें। साड़ी भी पहन लेते हैं। हर दिन अलग-अलग तरीकों से प्रदर्शन किया जाता है। इनके इसी तरह के तरीकों के चलते आम लोगों के साथ-2 मीडिया का ध्यान भी इन किसानों के आंदोलन पर गया है। इनके हालात देखकर किसी का भी दिल पसीज सकता है। उनके प्रति हमदर्दी पैदा हो सकती है। ये किसान पीएम मोदी को जंतर-मंतर पर बुलाना चाहते हैं ताकि अपनी व्यथा पीएम को सुना सकें! उनसे राहत पैकेज जारी करने के लिए राज़ी कर सकें। लेकिन पीएम ने अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है कि वो इन किसानों से मिलने जा सकते हैं।


दिल कहता है कि अगर पीएम मोदी इन किसानों से मिल लें तो एक बहुत अच्छा संदेश जाएगा। लेकिन दिल के साथ-साथ थोड़ा दिमाग़ लगाने में कोई हर्ज नहीं है। ख़बर है कि करीब 37 दिन से ये किसान आंदोलनरत हैं। इस दौरान ये किसान अरुण जेटली, राजनाथ सिंह, उमा भारती और राधा मोहन सिंह जैसे नेताओं से मिल चुके हैं। मद्रास हाईकोर्ट और राज्य सरकार के आदेश के बाद कोऑपरेटिव बैंकों ने इनका कर्जा पहले ही ख़ारिज कर दिया है। अब इन किसानों की मांग है कि केंद्र सरकार इन्हें नये सिरे से राहत पैकेज जारी करे क्योंकि सूखे से इनकी फसल बर्बाद हो चुकी है और अब नई फसल के लिए इनके पैसे नहीं है। बाकी लोन(शायद दूसरे बैंकों से लिया गया) माफ़ करें। किसानों की मांग से कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन तथ्य ये है कि देशभर के किसान इसी तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं। आज तमिलनाडु के किसान पीएम से मिलने की जिद पर अड़े हैं। इनकी मांगे मान ली गई तो महाराष्ट्र और दूसरे प्रदेशों के किसान भी इसी तरह की जिद कर सकते हैं। सवाल ये है कि क्या भारत सरकार का वित्त मंत्रालय इस हालात में है कि वो सारे देश के किसानों के लिए राहत पैकेज जारी कर सकता है? अगर ऐसा होता तो पीएम मोदी अब तक इन किसानों से मिल लिए होते! होना तो ये चाहिए कि किसानों को पहले अपनी राज्य सरकार पर दबाव डालना चाहिए। राज्य सरकारों का भी ये फर्ज है कि अपने-अपने प्रदेश के किसानों की समस्याओं के समाधान को लेकर टाल-मटोल वाला रवैया न रखें। तमिलानाडु सरकार को अपने स्तर पर और भी ज्यादा प्रयास करने चाहिए थे ताकि इन किसानों को जंतर-मंतर पर आकर प्रदर्शन करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। हालांकि किसानों की मांग जायज लगती है लेकिन पीएम मोदी द्वारा प्रदर्शनकारी किसानों से नहीं मिलने की भी ठोस वजहें हैं। अब ये देखना दिलचस्प होगा कि केंद्र सरकार इन किसानों के आंदोलन के प्रति कैसा रूख अख़्तियार करती है।

Thursday, December 8, 2016

ज़रूरी है शब्दों के चयन में सतर्कता

एक ज़िम्मेदार नागरिक और एक ज़िम्मेदार पत्रकार में क्या अंतर हो सकता है? हर नागरिक से अपेक्षा रहती है कि वो हर संभव एक बेहतर नागरिक बने। संविधान प्रदत्त अधिकारों के साथ- साथ अपने कर्तव्यों के प्रति भी सजग रहे। अपने जीवन में नित नई ऊंचाइयों को प्राप्त कर अपना और अपने देश का मान-सम्मान बढ़ाये। दूसरे नागरिकों के प्रति न केवल संवेदनशील बने बल्कि उनके अधिकारों का सम्मान भी करे। जरूरत पड़ने पर उनकी मदद करे और सभी के प्रति दयाभाव रखे। किसी भी तरह के जातिवाद व संप्रदायवाद से दूर रहे। ईमानदार व सतयनिष्ठ हो। आपसी भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए प्रयत्नशील रहे। अपने देश के संविधान में दिए गए प्रावधानों के अनुसार व्यवहार करे इत्यादि-इत्यादि! अगर किसी भी नागरिक में ये गुण हैं तो स्वाभाविक तौर पर वो नागरिक एक ज़िम्मेदार नागरिक माना जाएगा। एक जिम्मेदार नागरिक को अच्छा इंसान भी होना चाहिए। 

दूसरी तरफ़ एक पत्रकार की भूमिका काफ़ी चुनौतिपूर्ण होती है और केवल एक ज़िम्मेदार पत्रकार ही उस भूमिका के साथ न्याय कर सकता है। पत्रकार में एक ज़िम्मेदार नागरिक के सभी गुण होने चाहिए। हर पत्रकार से अपेक्षा रहती है कि वो उन तथ्यों से अवगत रहे जिनसे सामान्य नागरिक आम तौर पर अनभिज्ञ होते हैं। पत्रकार सच तलाशने वाला होता है। एक अच्छा पत्रकार संवेदनशीनल, ईमानदार व सत्यनिष्ठ होता है। पत्रकार से तटस्थ व निष्पक्ष होने की अपेक्षा की जाती है ताकि उसकी विश्वसनीयता बनी रहे। बिना विश्वसनीयता के पत्रकार की कल्पना करना भी मूर्खता है। पत्रकार को अपने विचारों से ज़्यादा तथ्यों को महत्व देना होता है। पत्रकार को हर तरह के जातिवाद, संप्रदायवाद और भेदभाव से दूर रहना होता है। पत्रकार से अपने शब्दों का चयन करते वक्त अत्यधिक सतर्कता बरतने की उम्मीद होती है ताकि उलझन पैदा न हो। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो एक पत्रकार की ज़िम्मेदारी एक नागरिक की ज़िम्मेदारी कहीं ज्यादा होती है।

पत्रकार अपनी ज़िम्मेदारी को सही ढंग से नहीं निभाता तो इसका परिणाम देश और समाज के साथ-साथ उसे स्वयं को भी भुगतना पड़ता है। उसकी विश्वसनीयता चली जाती है जिसके बाद वो पत्रकार, पत्रकार नहीं रहता!

सवाल उठता है कि  क्या आज की पत्रकारिता में इन आदर्शों को जिया जा रहा है? क्या पत्रकार ये ध्यान रखते हैं कि वे जो कह रहे हैं  वो पत्रकारिता के आदर्शों के ख़िलाफ़ तो नहीं है? 24/7 के दौर की पत्रकारिता में कई बार ऐसा लगता है कि कहीं कुछ कमी सी है। पत्रकारिता के आदर्श कहीं खो से गए लगते हैं। पुरज़ोर तरीके से अपनी बात रखने की चाह में शब्दों के चयन में सतर्कता दिखाई नहीं पड़ती। बात को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जा रह है। विशेषणों का अनावश्यक प्रयोग तमगे  बांटने में किया जा रहा है। इससे कहीं न कहीं पत्रकारों की विश्वसनीयता पर संकट मंडराने लगा है।


टीवी पत्रकारिता में रवीश कुमार एक बड़ा नाम है। उनकी अपनी एक इमेज है। उनके समर्थक उनकी साहसिक पत्रकारिता की तारीफ़ करते नहीं थकते। 5दिसंबर 2016, शाम 9 बजे रवीश कुमार ने एनडीटीवी पर प्राइम टाइम कार्यक्रम में उस वक्त अस्तपताल में मौत से जूझ रही जयललिता के रोते-बिलखते समर्थकों के संदर्भ में उत्तर भारत के कथित भक्तों के बारे में जिन शब्दों का प्रयोग किया है। उन शब्दों पर गौर करिए..।  

उत्तर भारत के लोग भक्त के बारे में जानते हैं! ‘भक्त उत्तर भारत की राजनीति का वो नया तत्व है जिसका नाम तो भक्त है मगर संस्कार भक्त के नहीं है। उसकी भाषा गालियों की है। अंध समर्थन की है। मारने पीटने की है। मूर्खता की है। भक्त होना सियासत में नेता का बाहुबली  बनना हो गया है। गुंडे का नया नाम है।


इन पंक्तियों में उलझन है। भक्त है लेकिन उसमें भक्त वाले संस्कार नहीं हैं तो फिर भक्त कैसे माना जा सकता है? अंध समर्थन के मापदंड कौन से हैं? कहते हैं कि गुंडे का नया नाम है। गुंडे को नया नाम देने की जरूरत क्यों पड़ गई? अगर गुंडा है तो फिर गुंडा ही रहने दीजिए न। गाली देना वाला भी भक्त नहीं होता! जबकि इस परिभाषा के अनुसार किसी भी सरकार या नेता का कोई भी अंध समर्थक जो गाली देता है, मारने पीटने को लेकर आमादा है, मूर्ख है, वो भक्त है!


किसी सरकार या किसी नेता के समर्थकों की ऐसी मनमानी व्याख्या पत्रकारिता के आदर्शों के अनुरूप है या नहीं इस पर बहस की गुंजाइश बनती है। इसमें संवेदनशीलता का अभाव झलकता है जबकि संवेदनशीलता पत्रकारिता का अहम तत्व है। अनावश्यक विशेषणों का प्रयोग किया गया लगता है जिनके चलते भ्रम की स्थिति नज़र आती है। आप ये भी कह सकते हैं कि पत्रकार महोदय ने शब्द चयन को लेकर थोड़ी और सावधानी बरती होती तो अच्छा रहता। पत्रकारिता की विश्वसनीयता बनाए रखने की ज़िम्मेदारी पत्रकारों के कंधों पर है लिहाजा उस ज़िम्मेदारी को उठाने में कोताही नहीं बरती जानी चाहिए।  मनमानी मत करिए। पत्रकार अपनी ज़िम्मेदारी को जितनी शिद्दत से निभाएंगे पत्रकारिता और पत्रकारों में जनता का विश्वास उतना ही गहरा होता जाएगा। 

Sunday, December 4, 2016

संसद में बज रहे ढोल की पोल

 संसद के शीतकालीन सत्र में गतिरोध जारी है। 13 दिन गुजर गए लेकिन काम-धंधा शुरू होने की कोई ख़ुशखबरी अभी तक नहीं मिली है। मलाल तो हो रहा होगा लेकिन कोई बात नहीं! संसद के सत्र तो आगे भी आते रहेंगे। काम-धाम की तब देखी जाएगी। इसलिए हैरान-परेशान होने की जरूरत नही है! बस नज़रिया बदलने की जरूरत है! संसद में हो रहे हंगामे को हंगामा कतई नहीं समझा जाना चाहिए! इसे ढोल बजाना कहते हैं! 

ये ढोल विपक्ष बजा रहा है! इस ढोल की आवाज सनिए! ये ढोल इसलिए बजाया जाता है ताकि जनता जान सके कि अगर बैंक के सामने खड़े-खड़े जनता परेशान है तो संसद में उनके नेता भी कोई चैन से नहीं बैठे हैं। हंगामा, नारेबाज़ी, धरना प्रदर्शन इत्यादि-इत्यादि कितना कुछ करना पड़ता है। अपने कुछ बंदों को नियमित रूप से टीवी पर भेजना पड़ता है ताकि जनता को बताया जा सके कि ढोल उन्होंने ही बजाया था। ताकि जाना जा सके कि ढोल की आवाज जनता ने सुनी कि नहीं सुनी!  ये समझाया जा सके कि ढोल बजाना कितना जरूरी था। ढोल बजाने में किन-किन दलों और नेताओं ने साथ दिया! जो नेता सहयोग करने की बजाए कानों में उंगली डाल कर सत्ता पक्ष की साइड हो लिए उनको लताड़ना पड़ता है!

जनता को समझाना होता है कि आपको और हमें यानि प्रतिपक्ष को परेशान करने वाला दुश्मन एक ही है। लिहाजा आप हमारे साथ आ जाये। जिसने हमें परेशान किया है उसे सबक सिखाने के लिए जनता का हमारे साथ आना बहुत जरूरी है! मतलब अब गेंद जनता यानि आपके पाले में है। अब आप सोच रहे होंगे कि आप गेंद का क्या करेंगे! जिस गेंद का इस्तेमाल काफी बाद में होना हो उस गेंद की अभी क्या जरूरत!  आपकी बात में दम है लेकिन निराश होने की जरूरत नहीं है। मैं फिर कहूंगा कि आप नज़रिया बदलो। ढोल बजाने वाले नेताओं की योग्यता और क्षमता पर भरोसा  बनाए रखो। अपनी परेशानियां उनके हवाले कर दो। वे आपकी परेशानियों का सही इस्तेमाल करेंगे! आपकी परेशानियों को सीढ़ी बनाकर टॉप पर पहुंचेंगे! आपकी परेशानियों का इससे अच्छा उपयोग नहीं हो सकता है!

आप इसे इस तरह भी समझ सकते कि संसद भले ही नहीं चल रही हो लेकिन बाकी तो सब चल रहा है! और जो चल रहा है वो भी कम अभूतपूर्व नहीं है! इसे समझना पड़ेगा! जरा सोचिए! संसद चलने से देश का भला हो जाता और सत्ता पक्ष की धाक जम जाती! लेकिन प्रतिपक्ष को सांत्वना पुरस्कार के अलावा कुछ हासिल नहीं होता! अब भला इस बात को कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है! जब संसद चलने के लिए पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों ही बराबर के जिम्मेदार होते हैं तो फायदा भी तो दोनों को बराबर ही होना चाहिए न! मतलब महज संसद चलने से ही तो काम नहीं चलने वाला है न। इसलिए संसद चलने से जरूरी है सबकी राजनीति चले। लिहाजा राजनीति चल रही है। राहुल गांधी भी चल निकले हैं! राहुल का चलना कितना जरूरी था ये आप कांग्रेस से पूछ सकते हैं! वैसे क्या वाकई पूछने की जरूरत है?  


    





Monday, November 28, 2016

नोटबंदी पर ग़ैर-जिम्मेदारी

पीएम मोदी ने आकाशवाणी के ज़रिए एक बार फिर से अपने मन की बातरखी तो ये जानकर अच्छा लगा कि मोदी जी विमुद्रीकरण यानि नोटबंदी के चलते नागरिकों को हो रही कठिनाईयों से अवगत हैं। होना भी चाहिए। एक विशाल जनसंख्या वाले देश में नोटबंदी जैसे फैसले के असर की जानकारी पीएम को हर हाल में होनी ही चाहिए ताकि ज़रूरत पड़ने पर उचित कदम उठाए जा सके। विमुद्रीकरण में सामने आए अच्छे और सुखद अनुभवों को साझा करना बहुतों को पसंद आया होगा जैसे कि सूरत में महज 500 रुपये में शादी संपन्न हो जाने की चर्चा। लेकिन नोटबंदी के चलते जो दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं सामने आई हैं अगर उन घटनाओं का ज़िक्र भी पीएम ने अपने संबोधन में कर दिया होता तो उसकी सराहना भी हर कोई करता! पीड़ित लोगों के जख़्मों पर मोदी जी ने सहानुभूति का मरहम लगा दिया होता उनका मन भी हलका हो जाता! ऐसा करने से न केवल सरकार की छवि बेहतर होने में मदद मिलती बल्कि पीड़ितों को भी दिलासा मिलता। लेकिन मोदी जी ने ऐसा नहीं किया।

पीएम कहते हैं कि नोटबंदी को भरपूर समर्थन मिल रहा है और देश की जनता अच्छे भारत के निर्माण में कष्ट सहकर भी सरकार के साथ है तो ये पूरा सच नहीं है। ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है जो नोटबंदी की पूरी कवायद पर ही सवाल खड़ा करते हैं। सवाल उठाने वाले सभी विपक्षी दलों के समर्थक हों ऐसा भी नहीं है। हां इनमें ऐसं बहुत से लोग हैं जो चाहकर भी नोटबंदी से होने वाली दिक्कतों को अनदेखा नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे ग़रीबों की संख्या भी कम नहीं है जिन्हें नोटबंदी के चलते बेहद कष्ट झेलने पड़ रहे हैं। भूखे रहने को मजबूर होना पड़ा है या पड़ रहा है। एटीएम के सामने लगी लंबी-लंबी कतारें अभी भी कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। कई जगह कैश की दिक्कत अभी तक बनी हुई है। ऐसी ख़बरें भी सामने आई हैं कि बेटी की शादी में बैंक से कैश नहीं मिलने पर उसके पिता ने आत्महत्या की है और ये भी किसी से छिपा नहीं है कि नोट बदलने के चलते कई लोगों की मौत हुई है।  मन की बात कार्यक्रम में अगर पीएम ने इनके प्रति भी अपनी संवेदना जताई होती तो इससे जनता के बीच उनके संवेदनशील पीएम होने का संदेश जाता।     

ये विडंबना भी देखिए कि अगर सरकार को नोटबंदी के चलते हो रही मुश्किलें नज़र नहीं आ रही हैं तो विपक्ष और सरकार के आलोचकों को इसमें कुछ भी अच्छा नज़र नहीं आ रहा है। यानि दोनों ही पक्ष नोटबंदी के बाद उपजे हालातों की सही तस्वीर को न सामने रखना चाहते हैं और न ही बात करना चाहते हैं। जब विपक्ष कहता है कि नोटबंदी से जनता त्राहिमाम कर रही है और इसका कोई लाभ देश को नहीं होने जा रहा है तो ये भी पूरी तरह सच नहीं है क्योंकि इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि देश में बड़ा वर्ग नोटबंदी का स्वागत कर रहा है। इस वर्ग का लगता है कि नोटबंदी से काले धन, नकली नोटों और आतंकवादियों के वित्तीय स्रोतों पर करारा प्रहार हुआ है। बड़ी मात्रा में कैश पकड़े जाने की अब तक कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। ये सब काला धन ही था। ये अनुमान लगाया जा रहा है कि कि आतंकवादियों पर भी नोटबंदी का खासा असर हुआ है। यानि नोटबंदी से कुछ हद तक इच्छित परिणाम भी सामने आ रह हैं। लेकिन विपक्ष और आलोचक इसे स्वीकारने के मूड में नहीं हैं जिसके चलते संसद के शीतकालीन सत्र में अब तक कोई काम नहीं हो सका है।  सही तस्वीर को जनता के सामने नहीं रखने के लिए विपक्ष को ग़ैर-ज़िम्मेदार क्यों न समझा जाए?  

जहां तक कैशलेस सोसायटी के निर्माण की बात है तो ऐसा लगता है कि मोदी जी उन लोगों को दौड़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं जिनमें बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो तेज चलने में भी सक्षम नहीं हैं। मतलब ये है कि कैशलेस सोसायटी बनने में व्यवहारिक दिक्कतें हैं। हालांकि इसका मतलब ये नहीं कि प्रयास ही न किया जाए। लिहाजा कैशलेस सोसायटी के लिए सरकार की पहल तो अच्छी है लेकिन धैर्य रखना होगा। इसमें वक्त लगेगा। सरकार को ज़ल्दबाज़ी से बचना चाहिए। फिलहाल तो कैश की कमी से जूझ रहे लोगों को राहत पहुंचाने के उपाय होने चाहिए।




Saturday, November 26, 2016

सबको बाइज्ज़त बरी करने वाली 'अदालत'!


पीएम मोदी के 'रोने' पर मायावती जी  ने चुटकी ले है। वैसे इरादा जान लेने का था!

'मेक इन इंडिया' में बहुत से लोग अपना योगदान कुछ इस तरह से भी दे रहे हैं कि वे जिसे चाहते हैं उसे 'भक्त' बना देते हैं!

वो जमाना गया जब 60-70 साल की ज़िंदगी भी इंसान को काफी लगती थी। आजकल तो इतने साल फेसबुक और व्हाट्स अप पर वी़डियो देखने में ही निकल जाते हैं।

ठहाके लगाने के लिए चुटकुले पढ़ना कतई जरूरी नहीं है। आप चाहें तो केजरीवाल जी 
के ट्वीट भी पढ़ सकते हैं।

एक हिसाब से मोदी जी कुछ भी न करे तो भी चलेगा क्योंकि 'भक्त' तब भी उनकी प्रशंसा ही करेंगे और विरोधी तो करने पर भी यही कहते हैं कि पीएम कुछ नहीं करते!

इंसानों की ज़हर उगलने की क़ाबिलियत को देखते हुए ज़हर उगलने वाले बाकी जीवों को स्वेच्छा से विलुप्त हो जाना चाहिए!

'स्वच्छ भारत अभियान' की तरह ही 'स्वस्थ खानपान अभियान' भी बेहद जरूरी है! हर नुक्कड़ पर मिलने वाली दूषित भोजन सामाग्री व ग़लत खानपान की आदतें भी पाकिस्तान जितनी ही ख़तरनाक हैं!

प्रधानमंत्री आवास वाली रेस कोर्स रोड का नया नाम 'लोक कल्याण मार्ग' है। नये नाम से ऐसी फील आती है जैसे ये नाम "कांग्रेस कल्याण मार्ग" से प्रेरित हो!

जब घमंड आ जाता है तो बाकी चीजें आना स्वत: ही बंद हो जाती हैं!

एक महीने की वैधता के साथ 100-200 एमबी डेटा देना ऐसा ही है जैसे किसी बच्चे को बिस्किट का एक पैकिट देकर कह दिया जाए कि जाओ बेटा महीने भर इसी से काम चलाओ!

"दुनिया की कोई ताकत हमसे कश्मीर नहीं छीन सकती", चंद शब्दों का ये डायलॉग पाकिस्तानियों के लिए 'मिर्ची बम' का काम करता है।

लोग नाहक ही राजनीति को बदनाम करते हैं। ये तो वो पेशा जिसमें बंदा आख़िरी सांस तक भी पीएम-सीएम बनने के चांस रखता है!

एक के बाद एक बड़ा विवाद पैदा करना ऐसा ही है जैसे देश के विकास की राह में पाकिस्तान छोड़ दिया हो!

एक समय था जब बिहार के भाईयों को काम-धंधे की तलाश में दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ता था। आज समय बदल गया है अब शराब के लिए करना पड़ता है!

भारत इकलौता ऐसा देश है जहां बड़ीं संख्या में ऐसे लोग रहते हैं जो स्वयं तो बेवकूफ बन जाते हैं लेकिन बेवकूफ बनाने वाले को हीरो बना देते हैं!

कहा जा रहा है कि इकॉनमी की सुधार की रफ्तार धीमी पड़ गई है! इसका कुछ श्रेय उन लोगों को भी दिया जाना चाहिए जो संसद नहीं चलने देते!

रजत शर्मा जी की 'आप की अदालत' एकमात्र ऐसी अदालत है जहां मुकदमा किसी पर भी चले उसका बाइज्जत बरी होना तय है!

स्मार्टफोन की कीमत पचास हजार भी हो, तब भी प्रचार करने वाला उसे 'सस्ता' बताकर, मेरे जैसों को ग़रीब होने का अहसास करा ही देता है!


कितनी दिलचस्प बात है कि सुबह से लेकर शाम तक कई मर्तबा बेवकूफ बनने के बाद भी इंसान अपने आप को ही सबसे ज्यादा अक्लमंद समझता है!

Wednesday, November 23, 2016

मेरे फेसबुक वॉल से..



मथुरा की एक महापंचायत ने अभिनेता अक्षय कुमार को पीटने का फरमान जारी किया है। समझ नहीं आ रहा है कि ये पीटने का फरमान है या आत्महत्या करने का ऐलान।


बात-बात पर परमाणु हमले की धमकी देने वाले पाकिस्तान में कोई झूठ भी बोल दे कि भारत भी पाकिस्तान पर परमाणु हमला करने वाला है तो एक भी पाकिस्तानी अपने घर में दिखाई नहीं देगा!


भारत को बर्बाद करने के लिए पाकिस्तान  बेवजह ही आंतकियों को भेजता है जबकि भारत के कुछ नेता और लोग इस काम को और भी अच्छे से कर सकते हैं!


चीन एकमात्र ऐसा देश हैं जिसका न तो सामान ही भरोसेमंद हैं और न ही नेतृत्व


दिल्ली की हवा का ज़हर दूर होना जरूरी है लेकिन दिमाग़ों में भरे ज़हर का दूर होना उससे भी ज्यादा जरूरी है।



जिन्होंने आज तक चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जैसों के ही गुण गाये हों वे नोटबंदी को लेकर हाहाकार मचाने वालों का समर्थन करें तो करें कैसे!


साइड इफेक्ट न हो तो नोटबंदी की कीमोथैरेपी काले धन के कीटाणुओं को ख़त्म करने के लिए एक प्रभावशाली उपाय है!


बीबीसी हिंदी को इंटरव्यू देते वक्त केजरीवाल जी इतनी बुरी तरह तड़क-भड़क गए कि पास में अगर कोई मोम का पुतला भी होता तो उसका भी बीपी हाई हो जाता!


ओवरटाइम करने के बावजूद केजरीवाल जी से ज्यादा सोनम गुप्ता की बेवफाई ने गदर काट दिया! यानि महज आरोपों की राजनीति राहुल गांधी से ज्यादा कुछ भी नहीं!


पाकिस्तान का नसीब अच्छा है कि हम दशहरा पर केवल बुराई के प्रतीक को ही जलाते हैं। कहीं बुराई को ही जलाना शुरू कर दिया तो पाकिस्तान का नंबर सबसे पहले लगेगा।

राहुल गांधी ने जितना बीजेपी के लिए किया है अगर उसका 1 प्रतिशत भी अपनी पार्टी के लिए करते तो आज कांग्रेस के भी अच्छे दिन आ गए होते!