Thursday, December 8, 2016

ज़रूरी है शब्दों के चयन में सतर्कता

एक ज़िम्मेदार नागरिक और एक ज़िम्मेदार पत्रकार में क्या अंतर हो सकता है? हर नागरिक से अपेक्षा रहती है कि वो हर संभव एक बेहतर नागरिक बने। संविधान प्रदत्त अधिकारों के साथ- साथ अपने कर्तव्यों के प्रति भी सजग रहे। अपने जीवन में नित नई ऊंचाइयों को प्राप्त कर अपना और अपने देश का मान-सम्मान बढ़ाये। दूसरे नागरिकों के प्रति न केवल संवेदनशील बने बल्कि उनके अधिकारों का सम्मान भी करे। जरूरत पड़ने पर उनकी मदद करे और सभी के प्रति दयाभाव रखे। किसी भी तरह के जातिवाद व संप्रदायवाद से दूर रहे। ईमानदार व सतयनिष्ठ हो। आपसी भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए प्रयत्नशील रहे। अपने देश के संविधान में दिए गए प्रावधानों के अनुसार व्यवहार करे इत्यादि-इत्यादि! अगर किसी भी नागरिक में ये गुण हैं तो स्वाभाविक तौर पर वो नागरिक एक ज़िम्मेदार नागरिक माना जाएगा। एक जिम्मेदार नागरिक को अच्छा इंसान भी होना चाहिए। 

दूसरी तरफ़ एक पत्रकार की भूमिका काफ़ी चुनौतिपूर्ण होती है और केवल एक ज़िम्मेदार पत्रकार ही उस भूमिका के साथ न्याय कर सकता है। पत्रकार में एक ज़िम्मेदार नागरिक के सभी गुण होने चाहिए। हर पत्रकार से अपेक्षा रहती है कि वो उन तथ्यों से अवगत रहे जिनसे सामान्य नागरिक आम तौर पर अनभिज्ञ होते हैं। पत्रकार सच तलाशने वाला होता है। एक अच्छा पत्रकार संवेदनशीनल, ईमानदार व सत्यनिष्ठ होता है। पत्रकार से तटस्थ व निष्पक्ष होने की अपेक्षा की जाती है ताकि उसकी विश्वसनीयता बनी रहे। बिना विश्वसनीयता के पत्रकार की कल्पना करना भी मूर्खता है। पत्रकार को अपने विचारों से ज़्यादा तथ्यों को महत्व देना होता है। पत्रकार को हर तरह के जातिवाद, संप्रदायवाद और भेदभाव से दूर रहना होता है। पत्रकार से अपने शब्दों का चयन करते वक्त अत्यधिक सतर्कता बरतने की उम्मीद होती है ताकि उलझन पैदा न हो। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो एक पत्रकार की ज़िम्मेदारी एक नागरिक की ज़िम्मेदारी कहीं ज्यादा होती है।

पत्रकार अपनी ज़िम्मेदारी को सही ढंग से नहीं निभाता तो इसका परिणाम देश और समाज के साथ-साथ उसे स्वयं को भी भुगतना पड़ता है। उसकी विश्वसनीयता चली जाती है जिसके बाद वो पत्रकार, पत्रकार नहीं रहता!

सवाल उठता है कि  क्या आज की पत्रकारिता में इन आदर्शों को जिया जा रहा है? क्या पत्रकार ये ध्यान रखते हैं कि वे जो कह रहे हैं  वो पत्रकारिता के आदर्शों के ख़िलाफ़ तो नहीं है? 24/7 के दौर की पत्रकारिता में कई बार ऐसा लगता है कि कहीं कुछ कमी सी है। पत्रकारिता के आदर्श कहीं खो से गए लगते हैं। पुरज़ोर तरीके से अपनी बात रखने की चाह में शब्दों के चयन में सतर्कता दिखाई नहीं पड़ती। बात को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जा रह है। विशेषणों का अनावश्यक प्रयोग तमगे  बांटने में किया जा रहा है। इससे कहीं न कहीं पत्रकारों की विश्वसनीयता पर संकट मंडराने लगा है।


टीवी पत्रकारिता में रवीश कुमार एक बड़ा नाम है। उनकी अपनी एक इमेज है। उनके समर्थक उनकी साहसिक पत्रकारिता की तारीफ़ करते नहीं थकते। 5दिसंबर 2016, शाम 9 बजे रवीश कुमार ने एनडीटीवी पर प्राइम टाइम कार्यक्रम में उस वक्त अस्तपताल में मौत से जूझ रही जयललिता के रोते-बिलखते समर्थकों के संदर्भ में उत्तर भारत के कथित भक्तों के बारे में जिन शब्दों का प्रयोग किया है। उन शब्दों पर गौर करिए..।  

उत्तर भारत के लोग भक्त के बारे में जानते हैं! ‘भक्त उत्तर भारत की राजनीति का वो नया तत्व है जिसका नाम तो भक्त है मगर संस्कार भक्त के नहीं है। उसकी भाषा गालियों की है। अंध समर्थन की है। मारने पीटने की है। मूर्खता की है। भक्त होना सियासत में नेता का बाहुबली  बनना हो गया है। गुंडे का नया नाम है।


इन पंक्तियों में उलझन है। भक्त है लेकिन उसमें भक्त वाले संस्कार नहीं हैं तो फिर भक्त कैसे माना जा सकता है? अंध समर्थन के मापदंड कौन से हैं? कहते हैं कि गुंडे का नया नाम है। गुंडे को नया नाम देने की जरूरत क्यों पड़ गई? अगर गुंडा है तो फिर गुंडा ही रहने दीजिए न। गाली देना वाला भी भक्त नहीं होता! जबकि इस परिभाषा के अनुसार किसी भी सरकार या नेता का कोई भी अंध समर्थक जो गाली देता है, मारने पीटने को लेकर आमादा है, मूर्ख है, वो भक्त है!


किसी सरकार या किसी नेता के समर्थकों की ऐसी मनमानी व्याख्या पत्रकारिता के आदर्शों के अनुरूप है या नहीं इस पर बहस की गुंजाइश बनती है। इसमें संवेदनशीलता का अभाव झलकता है जबकि संवेदनशीलता पत्रकारिता का अहम तत्व है। अनावश्यक विशेषणों का प्रयोग किया गया लगता है जिनके चलते भ्रम की स्थिति नज़र आती है। आप ये भी कह सकते हैं कि पत्रकार महोदय ने शब्द चयन को लेकर थोड़ी और सावधानी बरती होती तो अच्छा रहता। पत्रकारिता की विश्वसनीयता बनाए रखने की ज़िम्मेदारी पत्रकारों के कंधों पर है लिहाजा उस ज़िम्मेदारी को उठाने में कोताही नहीं बरती जानी चाहिए।  मनमानी मत करिए। पत्रकार अपनी ज़िम्मेदारी को जितनी शिद्दत से निभाएंगे पत्रकारिता और पत्रकारों में जनता का विश्वास उतना ही गहरा होता जाएगा। 

Sunday, December 4, 2016

संसद में बज रहे ढोल की पोल

 संसद के शीतकालीन सत्र में गतिरोध जारी है। 13 दिन गुजर गए लेकिन काम-धंधा शुरू होने की कोई ख़ुशखबरी अभी तक नहीं मिली है। मलाल तो हो रहा होगा लेकिन कोई बात नहीं! संसद के सत्र तो आगे भी आते रहेंगे। काम-धाम की तब देखी जाएगी। इसलिए हैरान-परेशान होने की जरूरत नही है! बस नज़रिया बदलने की जरूरत है! संसद में हो रहे हंगामे को हंगामा कतई नहीं समझा जाना चाहिए! इसे ढोल बजाना कहते हैं! 

ये ढोल विपक्ष बजा रहा है! इस ढोल की आवाज सनिए! ये ढोल इसलिए बजाया जाता है ताकि जनता जान सके कि अगर बैंक के सामने खड़े-खड़े जनता परेशान है तो संसद में उनके नेता भी कोई चैन से नहीं बैठे हैं। हंगामा, नारेबाज़ी, धरना प्रदर्शन इत्यादि-इत्यादि कितना कुछ करना पड़ता है। अपने कुछ बंदों को नियमित रूप से टीवी पर भेजना पड़ता है ताकि जनता को बताया जा सके कि ढोल उन्होंने ही बजाया था। ताकि जाना जा सके कि ढोल की आवाज जनता ने सुनी कि नहीं सुनी!  ये समझाया जा सके कि ढोल बजाना कितना जरूरी था। ढोल बजाने में किन-किन दलों और नेताओं ने साथ दिया! जो नेता सहयोग करने की बजाए कानों में उंगली डाल कर सत्ता पक्ष की साइड हो लिए उनको लताड़ना पड़ता है!

जनता को समझाना होता है कि आपको और हमें यानि प्रतिपक्ष को परेशान करने वाला दुश्मन एक ही है। लिहाजा आप हमारे साथ आ जाये। जिसने हमें परेशान किया है उसे सबक सिखाने के लिए जनता का हमारे साथ आना बहुत जरूरी है! मतलब अब गेंद जनता यानि आपके पाले में है। अब आप सोच रहे होंगे कि आप गेंद का क्या करेंगे! जिस गेंद का इस्तेमाल काफी बाद में होना हो उस गेंद की अभी क्या जरूरत!  आपकी बात में दम है लेकिन निराश होने की जरूरत नहीं है। मैं फिर कहूंगा कि आप नज़रिया बदलो। ढोल बजाने वाले नेताओं की योग्यता और क्षमता पर भरोसा  बनाए रखो। अपनी परेशानियां उनके हवाले कर दो। वे आपकी परेशानियों का सही इस्तेमाल करेंगे! आपकी परेशानियों को सीढ़ी बनाकर टॉप पर पहुंचेंगे! आपकी परेशानियों का इससे अच्छा उपयोग नहीं हो सकता है!

आप इसे इस तरह भी समझ सकते कि संसद भले ही नहीं चल रही हो लेकिन बाकी तो सब चल रहा है! और जो चल रहा है वो भी कम अभूतपूर्व नहीं है! इसे समझना पड़ेगा! जरा सोचिए! संसद चलने से देश का भला हो जाता और सत्ता पक्ष की धाक जम जाती! लेकिन प्रतिपक्ष को सांत्वना पुरस्कार के अलावा कुछ हासिल नहीं होता! अब भला इस बात को कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है! जब संसद चलने के लिए पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों ही बराबर के जिम्मेदार होते हैं तो फायदा भी तो दोनों को बराबर ही होना चाहिए न! मतलब महज संसद चलने से ही तो काम नहीं चलने वाला है न। इसलिए संसद चलने से जरूरी है सबकी राजनीति चले। लिहाजा राजनीति चल रही है। राहुल गांधी भी चल निकले हैं! राहुल का चलना कितना जरूरी था ये आप कांग्रेस से पूछ सकते हैं! वैसे क्या वाकई पूछने की जरूरत है?  


    





Monday, November 28, 2016

नोटबंदी पर ग़ैर-जिम्मेदारी

पीएम मोदी ने आकाशवाणी के ज़रिए एक बार फिर से अपने मन की बातरखी तो ये जानकर अच्छा लगा कि मोदी जी विमुद्रीकरण यानि नोटबंदी के चलते नागरिकों को हो रही कठिनाईयों से अवगत हैं। होना भी चाहिए। एक विशाल जनसंख्या वाले देश में नोटबंदी जैसे फैसले के असर की जानकारी पीएम को हर हाल में होनी ही चाहिए ताकि ज़रूरत पड़ने पर उचित कदम उठाए जा सके। विमुद्रीकरण में सामने आए अच्छे और सुखद अनुभवों को साझा करना बहुतों को पसंद आया होगा जैसे कि सूरत में महज 500 रुपये में शादी संपन्न हो जाने की चर्चा। लेकिन नोटबंदी के चलते जो दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं सामने आई हैं अगर उन घटनाओं का ज़िक्र भी पीएम ने अपने संबोधन में कर दिया होता तो उसकी सराहना भी हर कोई करता! पीड़ित लोगों के जख़्मों पर मोदी जी ने सहानुभूति का मरहम लगा दिया होता उनका मन भी हलका हो जाता! ऐसा करने से न केवल सरकार की छवि बेहतर होने में मदद मिलती बल्कि पीड़ितों को भी दिलासा मिलता। लेकिन मोदी जी ने ऐसा नहीं किया।

पीएम कहते हैं कि नोटबंदी को भरपूर समर्थन मिल रहा है और देश की जनता अच्छे भारत के निर्माण में कष्ट सहकर भी सरकार के साथ है तो ये पूरा सच नहीं है। ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है जो नोटबंदी की पूरी कवायद पर ही सवाल खड़ा करते हैं। सवाल उठाने वाले सभी विपक्षी दलों के समर्थक हों ऐसा भी नहीं है। हां इनमें ऐसं बहुत से लोग हैं जो चाहकर भी नोटबंदी से होने वाली दिक्कतों को अनदेखा नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे ग़रीबों की संख्या भी कम नहीं है जिन्हें नोटबंदी के चलते बेहद कष्ट झेलने पड़ रहे हैं। भूखे रहने को मजबूर होना पड़ा है या पड़ रहा है। एटीएम के सामने लगी लंबी-लंबी कतारें अभी भी कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। कई जगह कैश की दिक्कत अभी तक बनी हुई है। ऐसी ख़बरें भी सामने आई हैं कि बेटी की शादी में बैंक से कैश नहीं मिलने पर उसके पिता ने आत्महत्या की है और ये भी किसी से छिपा नहीं है कि नोट बदलने के चलते कई लोगों की मौत हुई है।  मन की बात कार्यक्रम में अगर पीएम ने इनके प्रति भी अपनी संवेदना जताई होती तो इससे जनता के बीच उनके संवेदनशील पीएम होने का संदेश जाता।     

ये विडंबना भी देखिए कि अगर सरकार को नोटबंदी के चलते हो रही मुश्किलें नज़र नहीं आ रही हैं तो विपक्ष और सरकार के आलोचकों को इसमें कुछ भी अच्छा नज़र नहीं आ रहा है। यानि दोनों ही पक्ष नोटबंदी के बाद उपजे हालातों की सही तस्वीर को न सामने रखना चाहते हैं और न ही बात करना चाहते हैं। जब विपक्ष कहता है कि नोटबंदी से जनता त्राहिमाम कर रही है और इसका कोई लाभ देश को नहीं होने जा रहा है तो ये भी पूरी तरह सच नहीं है क्योंकि इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि देश में बड़ा वर्ग नोटबंदी का स्वागत कर रहा है। इस वर्ग का लगता है कि नोटबंदी से काले धन, नकली नोटों और आतंकवादियों के वित्तीय स्रोतों पर करारा प्रहार हुआ है। बड़ी मात्रा में कैश पकड़े जाने की अब तक कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। ये सब काला धन ही था। ये अनुमान लगाया जा रहा है कि कि आतंकवादियों पर भी नोटबंदी का खासा असर हुआ है। यानि नोटबंदी से कुछ हद तक इच्छित परिणाम भी सामने आ रह हैं। लेकिन विपक्ष और आलोचक इसे स्वीकारने के मूड में नहीं हैं जिसके चलते संसद के शीतकालीन सत्र में अब तक कोई काम नहीं हो सका है।  सही तस्वीर को जनता के सामने नहीं रखने के लिए विपक्ष को ग़ैर-ज़िम्मेदार क्यों न समझा जाए?  

जहां तक कैशलेस सोसायटी के निर्माण की बात है तो ऐसा लगता है कि मोदी जी उन लोगों को दौड़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं जिनमें बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो तेज चलने में भी सक्षम नहीं हैं। मतलब ये है कि कैशलेस सोसायटी बनने में व्यवहारिक दिक्कतें हैं। हालांकि इसका मतलब ये नहीं कि प्रयास ही न किया जाए। लिहाजा कैशलेस सोसायटी के लिए सरकार की पहल तो अच्छी है लेकिन धैर्य रखना होगा। इसमें वक्त लगेगा। सरकार को ज़ल्दबाज़ी से बचना चाहिए। फिलहाल तो कैश की कमी से जूझ रहे लोगों को राहत पहुंचाने के उपाय होने चाहिए।




Saturday, November 26, 2016

सबको बाइज्ज़त बरी करने वाली 'अदालत'!


पीएम मोदी के 'रोने' पर मायावती जी  ने चुटकी ले है। वैसे इरादा जान लेने का था!

'मेक इन इंडिया' में बहुत से लोग अपना योगदान कुछ इस तरह से भी दे रहे हैं कि वे जिसे चाहते हैं उसे 'भक्त' बना देते हैं!

वो जमाना गया जब 60-70 साल की ज़िंदगी भी इंसान को काफी लगती थी। आजकल तो इतने साल फेसबुक और व्हाट्स अप पर वी़डियो देखने में ही निकल जाते हैं।

ठहाके लगाने के लिए चुटकुले पढ़ना कतई जरूरी नहीं है। आप चाहें तो केजरीवाल जी 
के ट्वीट भी पढ़ सकते हैं।

एक हिसाब से मोदी जी कुछ भी न करे तो भी चलेगा क्योंकि 'भक्त' तब भी उनकी प्रशंसा ही करेंगे और विरोधी तो करने पर भी यही कहते हैं कि पीएम कुछ नहीं करते!

इंसानों की ज़हर उगलने की क़ाबिलियत को देखते हुए ज़हर उगलने वाले बाकी जीवों को स्वेच्छा से विलुप्त हो जाना चाहिए!

'स्वच्छ भारत अभियान' की तरह ही 'स्वस्थ खानपान अभियान' भी बेहद जरूरी है! हर नुक्कड़ पर मिलने वाली दूषित भोजन सामाग्री व ग़लत खानपान की आदतें भी पाकिस्तान जितनी ही ख़तरनाक हैं!

प्रधानमंत्री आवास वाली रेस कोर्स रोड का नया नाम 'लोक कल्याण मार्ग' है। नये नाम से ऐसी फील आती है जैसे ये नाम "कांग्रेस कल्याण मार्ग" से प्रेरित हो!

जब घमंड आ जाता है तो बाकी चीजें आना स्वत: ही बंद हो जाती हैं!

एक महीने की वैधता के साथ 100-200 एमबी डेटा देना ऐसा ही है जैसे किसी बच्चे को बिस्किट का एक पैकिट देकर कह दिया जाए कि जाओ बेटा महीने भर इसी से काम चलाओ!

"दुनिया की कोई ताकत हमसे कश्मीर नहीं छीन सकती", चंद शब्दों का ये डायलॉग पाकिस्तानियों के लिए 'मिर्ची बम' का काम करता है।

लोग नाहक ही राजनीति को बदनाम करते हैं। ये तो वो पेशा जिसमें बंदा आख़िरी सांस तक भी पीएम-सीएम बनने के चांस रखता है!

एक के बाद एक बड़ा विवाद पैदा करना ऐसा ही है जैसे देश के विकास की राह में पाकिस्तान छोड़ दिया हो!

एक समय था जब बिहार के भाईयों को काम-धंधे की तलाश में दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ता था। आज समय बदल गया है अब शराब के लिए करना पड़ता है!

भारत इकलौता ऐसा देश है जहां बड़ीं संख्या में ऐसे लोग रहते हैं जो स्वयं तो बेवकूफ बन जाते हैं लेकिन बेवकूफ बनाने वाले को हीरो बना देते हैं!

कहा जा रहा है कि इकॉनमी की सुधार की रफ्तार धीमी पड़ गई है! इसका कुछ श्रेय उन लोगों को भी दिया जाना चाहिए जो संसद नहीं चलने देते!

रजत शर्मा जी की 'आप की अदालत' एकमात्र ऐसी अदालत है जहां मुकदमा किसी पर भी चले उसका बाइज्जत बरी होना तय है!

स्मार्टफोन की कीमत पचास हजार भी हो, तब भी प्रचार करने वाला उसे 'सस्ता' बताकर, मेरे जैसों को ग़रीब होने का अहसास करा ही देता है!


कितनी दिलचस्प बात है कि सुबह से लेकर शाम तक कई मर्तबा बेवकूफ बनने के बाद भी इंसान अपने आप को ही सबसे ज्यादा अक्लमंद समझता है!

Wednesday, November 23, 2016

मेरे फेसबुक वॉल से..



मथुरा की एक महापंचायत ने अभिनेता अक्षय कुमार को पीटने का फरमान जारी किया है। समझ नहीं आ रहा है कि ये पीटने का फरमान है या आत्महत्या करने का ऐलान।


बात-बात पर परमाणु हमले की धमकी देने वाले पाकिस्तान में कोई झूठ भी बोल दे कि भारत भी पाकिस्तान पर परमाणु हमला करने वाला है तो एक भी पाकिस्तानी अपने घर में दिखाई नहीं देगा!


भारत को बर्बाद करने के लिए पाकिस्तान  बेवजह ही आंतकियों को भेजता है जबकि भारत के कुछ नेता और लोग इस काम को और भी अच्छे से कर सकते हैं!


चीन एकमात्र ऐसा देश हैं जिसका न तो सामान ही भरोसेमंद हैं और न ही नेतृत्व


दिल्ली की हवा का ज़हर दूर होना जरूरी है लेकिन दिमाग़ों में भरे ज़हर का दूर होना उससे भी ज्यादा जरूरी है।



जिन्होंने आज तक चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जैसों के ही गुण गाये हों वे नोटबंदी को लेकर हाहाकार मचाने वालों का समर्थन करें तो करें कैसे!


साइड इफेक्ट न हो तो नोटबंदी की कीमोथैरेपी काले धन के कीटाणुओं को ख़त्म करने के लिए एक प्रभावशाली उपाय है!


बीबीसी हिंदी को इंटरव्यू देते वक्त केजरीवाल जी इतनी बुरी तरह तड़क-भड़क गए कि पास में अगर कोई मोम का पुतला भी होता तो उसका भी बीपी हाई हो जाता!


ओवरटाइम करने के बावजूद केजरीवाल जी से ज्यादा सोनम गुप्ता की बेवफाई ने गदर काट दिया! यानि महज आरोपों की राजनीति राहुल गांधी से ज्यादा कुछ भी नहीं!


पाकिस्तान का नसीब अच्छा है कि हम दशहरा पर केवल बुराई के प्रतीक को ही जलाते हैं। कहीं बुराई को ही जलाना शुरू कर दिया तो पाकिस्तान का नंबर सबसे पहले लगेगा।

राहुल गांधी ने जितना बीजेपी के लिए किया है अगर उसका 1 प्रतिशत भी अपनी पार्टी के लिए करते तो आज कांग्रेस के भी अच्छे दिन आ गए होते!

Tuesday, November 22, 2016

विमुद्रीकरण और रेल दुर्घटना

दुखद और निराशाजनक
---------------------------
विमुद्रीकरण के चलते लोगों की जान जाना बेहद दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है। हालांकि ज़िंदगी और मौत पर किसी का वश तो नहीं है लेकिन चूंकि ये मौतें एक ऐसी योजना के क्रियांवयन के दौरान हुई हैं या हो रही हैं जो सरकार की है। लिहाजा सरकार का फ़र्ज़ ही नहीं बल्कि नैतिक ज़िम्मेदारी भी है कि वो इन मौतों पर न केवल हार्दिक संवेदना व्यक्त करे बल्कि उनके पीड़ित परिजनों को उचित मुआवजा भी दे। केंद्र सरकार की तरफ़ से अभी तक ऐसी किसी पहल का नहीं होना बेहद दुखद और निराशाजनक है।


********************

********************
राज्यसभा में पीएम के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक नारे लगाने वाले सांसदों ने साबित कर दिया है कि उन्हें न तो संसद की मर्यादा की ही कोई चिंता है और न ही जनता के दुखदर्द से उनका कोई लेना देना है! वरना सरकार का विरोध तो शालीन तरीके से भी किया जा सकता था। क्या आपत्तिजनक नारे लगाने से उस आम आदमी की परेशानी कुछ कम हुई जिसके नाम पर संसद में इतना हंगामा किया जा रहा है? नारेबाज़ सासंदों के ऐसे व्यवहार से सरकार के उस दावे को ही बल मिलता है जिसके मुताबिक केवल वही सियासी दल या नेता नोटबंदी से दुखी हैं जिनके पास काला धन है। विपक्ष की इस मांग में भी ज्यादा दम नहीं है कि बहस का जवाब पीएम ही दें। विमुद्रीकरण पर पूरा देश पीएम मोदी के विचारों से अवगत है इसलिए पीएम से ही जवाब मांगने की जिद पर अड़ना कितना सही है इस पर भी सोचा जाना चाहिए! इसके बजाए जो भी मंत्री सरकार की ओर से जवाब दे रहे हैं उनसे ही नोटबंदी योजना के क्रियांवयन में आ रही दिक्कतों पर सवाल किया जाना जनता के हक में होता। लेकिन दिक्कत ये है कि जनता तो एक बहाना भर है। असली मकसद तो कुछ और ही नज़र आता है।


********************

********************

सुनो सरकार..

--------------
इंदौर-पटना एक्सप्रेस रेल हादसे के पीड़ितों को मुआवजे का मरहम कोई राहत पहुंचाए या न पहुंचाए लेकिन अगर रेलवे सुरक्षा की खामियों की मरहम पट्टी कर इसे दुर्घटनामुक्त बना दिया जाए तो हर किसी को राहत मिलेगी। अक्सर होने वाली हृदय विदारक रेल दुर्घटनाओं को बर्दाश्त करना बेहद मुश्किल है सरकार। हादसे में असमय ही काल के गाल में समाने वाले लोगों की चीखें लंबे समय तक चैन से सोने नहीं देती। हंसते-खेलते, किलकारी मारते और मां की गोद में चैन से सोते हुए सफ़र कर रहे मासूमों का यूं हमेशा के लिए ख़ामोश हो जाना दिल तोड़ कर रख देता। इसे रोकिए सरकार। इसे रोकने के लिए जो कुछ भी बन पड़ता है उसे करिए। मगर करिए जरूर!

******************
******************
विमुद्रीकरण(Demonetisation) के विरोध में तो कुछ नहीं कहना लेकिन कुछ घटनाएं ऐसे भी सामने आ रही हैं जिन्हें सुनकर मन विचलित हो जाता है, दिल बैठ जाता है। काले धन पर प्रहार होने की ख़ुशी तब काफ़ूर हो जाती है जब ये पता चलता है कि एक बैंक मैनेजर का ड्यूटी के दौरान ही काम के दबाव में हार्ट फेल हो गया या 9-10 दिन बाद भी लाइन में लगे बहुत से लोगो की शिक़ायत कि अभी भी उन्हें पैसा नहीं मिल रहा है जबकि उन्हें पैसे की सख़्त जरूरत है क्योंकि किसी की गर्भवती पत्नी को ख़ून चढ़ना है तो किसी का कोई अपना अस्तपताल में ज़िदगी और मौत के बीच झूल रहा है या कुछ और जरूरते हैं। कितने लोग तो दिन निकलने से पहले ही बैंक पहुंच जाते हैं। बावजूद इसके उन्हें निराशा ही हाथ लगती है। 'आज तक' चैनल पर देखा कि दिल्ली के एक बैंक मैनेजर की आंखों में उस वक्त आंसू आ जाते हैं जब एक कस्टमर उनके साथ बुरा बर्ताव करता है। मैनेजर के मुताबिक उसने पिछले साल ही कैंसर का ट्रीटमैंट लिया है और अभी दवाई जारी है। ज्यादा देर बैठने से दर्द भी होता है। मैंनेजर की हालत देखकर उससे वास्तव में सहानुभूति हो रही है। कहने को तो सरकार अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रही हो लेकिन ये कोशिश नाकाफ़ी लगती है। वहीं सरकार द्वारा किए जा रहे राहत के कुछ उपाय तो ऐसे हैं जिन्हें पहले भी किया जा सकता था।

Sunday, November 20, 2016

विमुद्रीकरण पर घिरी सरकार

अर्थव्यवस्था में जब काले धन और नकली मुद्रा की मात्रा बढ़ जाती है तो इससे निपटने का एक उपाय विमुद्रीकरण (Demonetization) है। काले धन के ख़िलाफ़ लड़ाई छेड़ते हुए पीएम मोदी ने 8 नवंबर 2016 की शाम को देश को संबोधित करते हुए 500 और 1000 के प्रचलित नोटों को बंद कर इनके स्थान पर नये नोट लाने की घोषणा की थी। इसे ही विमुद्रीकरण कहा जाता है। सरकार ने योजना के तहत पुराने नोटों को जमा करने या उनके बदले नये नोट लेने को लेकर विस्तृत कार्य योजना और 30 दिसंबर तक का समय निर्धारित किया है। हालांकि जो लोग किसी कारण 30 दिसंबर तक भी नोट जमा या बदल नहीं सके तो उन्हें 31 मार्च 2017 तक रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित केंद्रों पर पुराने नोट जमा कराने का मौक़ा मिलेगा।  


सरकार की इस घोषणा  से पूरा देश हैरान रह गया। हालांकि शुरुआत में लगभग सभी ने इसकी प्रशंसा करते हुए इसे साहसिक कदम बताया था। लेकिन योजना पर अमल के दौरान जब बैंकों के सामने लंबी-लंबी कतारें लगनी शुरू हुई तो सरकार की तैयारियों पर सवालिया निशान लगने लगे। बैंकों और एटीएम के सामने  कैश की किल्लत के चलते कतार में खड़े लोगों का धैर्य जवाब देने लगा। इस दौरान कुछ लोगों की जान भी चली गई। बैंक कर्मचारियों पर भी दबाव बढ़ गया जिसके चलते कुछ जगह से कुछ बैंककर्मियों की मौत होने की ख़बरें भी सुर्खियां बनी। क्रियांवयन पर पैनी नज़र बनाए रखते हुए सरकार लोगों को राहत देने के लिए कई उपायों की घोषणा भी लगातार कर रही है। जरुरत के हिसाब से रोज नये-नये दिशा निर्देश भी जारी कर रही है। इन दिशा निर्देशों का असर सामने भी आया है।


लेकिन बहुत से विशेषज्ञों की मानें तो ऐसा लगता है कि सरकार ने काले धन के ख़िलाफ लड़ाई छेड़ते वक़्त शायद पूरी तैयारी नहीं की थी। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा ग़रीब मजदरों व उन लोगों को भुगतना पड़ा है जिनके यहां या तो शादी है या जिनके परिजन ईलाज के लिए प्राइवेट अस्पतालों में भर्ती हैं।  ये सब नये नोटों की कमी से बेहाल है। मजूदरों को काम नहीं मिल रहा है क्योंकि आर्थिक गतिविधियां या तो लगभग ठप पड़ गई है या बेहद धीमी हो गई। विमुद्रीकरण की मार देश के अन्नदाता पर भी पड़ी है। किसान अपनी ख़रीफ की फसल को पैसे की कमी के चलते औने- पौने दामों पर बेचने को मजबूर हैं। रबी की बुआई का सीजन है लेकिन बीज खरीदने के लिए के लिए रुपये नहीं है। हालांकि सरकार ने बाद में किसानों को और शादी की तैयारी में जुटे परिवारों के लिए धन निकासी की सीमा बढ़ाकर कुछ राहत देने का प्रयास जरूर किया था। किसान एक सप्ताह में 50 हजार व शादी वाले परिवार शादी का कार्ड का दिखाकर ढाई लाख रुपये तक निकाल सकते हैं। लेकिन किसानों और शादी वाले परिवारों की शिक़ायत है कि बैंकों के सामने लंबी लंबी कतारों और बैंकों में कैश की कमी के चलते वे इस राहत का लाभ भी नहीं उठा पा रहे हैं। बीते शनिवार तक शहरों में हालात कुछ हद जरूर सुधरे हैं लेकिन ग्रामीण और दूर-दराज के क्षेत्रों में कैश की किल्लत अभी तक बनी हुई है।  


इस सभी बातों को लेकर पहले से ही विमुद्रीकरण की व्यवहारिकता पर सवाल उठा रहे विपक्ष ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया। बहुत से विशेषज्ञों ने भी विमुद्रीकरण के औचित्य पर ही सवाल उठाए हैं। पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने भी सरकार के इस फैसले को ग़लत बताया है। आलोचकों का कहना है कि इससे केवल गरीबों को ही परेशानी का सामना करना पड़ेगा। सोशल मीडिया पर भी ज़बरदस्त बहस छिड़ी हुई है। सरकार समर्थक लोग जहां इसे काले धन पर कड़ा प्रहार बता रहे हैं तो विरोधी और आलोचक इसकी जमकर आलोचना कर रहे हैं। दिल्ली के सीएम और आआपा के संयोजक अरविंद केजरीवाल तो इसे आज़ाद भारत का सबसे बड़ा घोटाला बता रहे हैं तो कांग्रेंस पार्टी योजना के क्रियांवयन को लेकर सवाल उठा रही है। कुलमिलाकर कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, बीएसपी और आआपा जैसे दल सरकार पर हमलावर हो गए। कुछ दलों ने तो सरकार से ये अपील भी की है कि वो इसे तत्काल रोक दे। विमुद्रीकरण को वापस लेने की मांग करने वालों में पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने बेहद उग्र रवैया अपनाया हुआ है। दोनों ही नेताओं ने इस योजना को वापस लेने के लिए न केवल अल्टीमेटम दिया है बल्कि ऐसा नहीं करने पर देशभर में आंदोलन और रैलियां करने के भी संकेत दिए हैं। बुधवार से शुरू हुए संसद के शीतकालीन सत्र के पहले तीन दिन भी इसी मुद्दे पर हंगामें की भेंट चढ़ चुके हैं। 


हालांकि सरकार ने ये साफ़ कर दिया है कि वो विमुद्रीकरण (मीडिया में इसे नोटबंदी भी कहा जा रहा है) का फ़ैसला वापस नहीं लेगी। सरकार फैसला वापस लेने की स्थिति में है भी नहीं। लिहाजा अच्छा ये होगा कि आगामी सप्ताह में और भी ज्यादा व्यवहारिक रवैया अपनाया जाए। साथ ही दूर-दराज के क्षेत्रों में नकदी संकट को दूर करने के उपाय तत्काल किए जाएं। क्रियांवयन को लेकर विपक्ष के आरोप बेजा नहीं हैं। सरकार का प्रयास होना चाहिए कि आरोपों पर तिलमिलाने की बजाय विपक्ष को सहयोग के लिए प्रेरित करे। वहीं विपक्ष को समझना चाहिए कि विमुद्रीकरण पर सरकार का पीछे हटना नामुमकिन है लिहाजा रचनात्मक सहयोग के लिए उसे भी आगे आना चाहिए।  





Monday, November 14, 2016

मेरे फेसबुक वॉल से




1- नोटबैन से होने वाली परेशानी को देखते हुए ही सभी से सहयोग की अपील की गई थी।
   मगर कुछ लोगों ने सहयोग तो दूर उल्टे 'असहयोग आंदोलन' छेड़ दिया!



2-भारत में कुछ लोग इसलिए परेशान हैं कि मोदीजी जैसा शख़्स हमारा पीएम हैं वहीं सभी पाकिस्तानी इसलिए    परेशान हैं कि हमारा पीएम मोदजी जैसा क्यों नहीं!


3-नोटबंदी को लेकर गालियां और तालियां दोनों ही मिल रही हैं। वैसे मोदी जी की माने तो कुछ लोग आशीर्वाद   भी दे रहे हैं!

4-'आज तक' के कार्यक्रम 'ख़बरदार' में काले धन को सफेद बनाने वाले कुछ लोगों को देखकर विश्वास नहीं         होता कि शहीदों के इस देश में कैसे-कैसे 'हरामी' पैदा हो गए!


5-जो भी नेता आम लोगों की परेशानी के नाम पर नोटबंदी का तीखा विरोध कर रहे हैं उन पर विश्वास नहीं          होता। लेकिन उनकी दाढ़ी में तिनका जरूर नज़र आता है!


6-मुलायम सिंह यादव ने यूपी चुनाव में किसी से भी गठबंधन से इंकार किया है। मतलब प्रशांत किशोर को        अपनी नाक बचाने के लिए अब कुछ और उपाय सोचना होगा!


7-केजरीवाल जी ने बड़े नोटों पर हुए फैसले पर भले ही अभी तक कोई Tweet नहीं किया हो लेकिन फैसले    का विरोध करने वाले करारे- करारे Tweets को Retweet कर अपनी मंशा तो ज़ाहिर कर ही दी



8-राहुल गांधी गुस्सा हैं कि हज़ार-पांचसों के नोट बंद करते वक्त आम लोगों का ख्याल नहीं रखा गया। वहीं    आम आदमी ख़ुश है कि ख़ास लोगों का ध्यान तो रखा गया है!


9-ट्रंप के भाषण को सुनकर कुछ-कुछ ऐसी फील आ रही है कि ये बंदा मोदी जी से कुछ ज्यादा ही प्रभावित है!



10-जो लोग पीएम मोदी और डोनाल्ड ट्रंप दोनों से नफ़रत करते हैं उनके लिए 9 नवंबर क़यामत से कम नहीं        है!


11-ये भी कम दिलचस्प नहीं कि डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने को लेकर बंदर और मछली की भविष्यवाणी         सच हो गई लेकिन इंसानों की ग़लत!

Saturday, December 12, 2015

दंगे के आरोपी और मंत्री जी

मोदी सरकार में कृषि राज्यमंत्री संजीव बाल्यान, मुजफ्फरनगर दंगों के आरोपियों से जेल में जाकर मिले।  मंत्री महोदय के इस कदम से कुछ लोग जरूर हैरान होंगे। वैसे भी पहली नज़र में देखे तो संवैधानिक पद पर बैठे किसी भी व्यक्ति को ऐसा नहीं करना चाहिए। इससे समाज में गलत संदेश जाता है। जो समाज पहले से ही बंटा हुआ है उसके बीच की खाई और चोड़ी होती है।  मंत्री किसी समुदाय विशेष का नहीं बल्कि पूरे देश का होता है। लिहाजा उसकी जिम्मेदारियां भी बड़ी होती है जिनसे मुहं नहीं मोड़ा जा सकता।

लेकिन हमें इस खबर के दूसरे पहलू पर भी गौर करना होगा। आखिर क्या वजह हो सकती है कि कोई केंद्रीय मंत्री जेल जाकर, कथित तौर पर दंगा और बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों के आरोपियों से न केवल मिलता है बल्कि उनको हर संभव मदद देने का वादा भी करता है। इस खबर का यही वो पहलू है जिस पर हमें ध्यान देना होगा। पहलू ये है कि मुजफ्फरनगर दंगों में लोगों ने कई फर्जी मुकदमें भी दर्ज कराए थे। ये बात खुद उन लोगों ने स्वीकारी है जिन्होंने फर्जी मुकदमे दर्ज कराए थे। दुखद बात ये है कि फर्जी मुकदमें बड़े स्तर पर दर्ज कराए गए थे। किसी से आपसी रंजिश थी या कोई और विवाद था तो लोगों ने बदला लेने के लिए दंगों का आरोपी बना दिया था। दंगा प्रभावित इलाकों में आज भी कई लोग फर्जी मुकदमों में फंसे होने की बात कहते मिल जाएंगे। मंत्री महोदय जिन आरोपियों से मिले थे उनमें से गौरव नाम के आरोपी पर कथित तौर पर फर्जी मुकदमा दायर किया गया था। नीचे लिखे पैराग्राफ इंडिया टुडे की खबर से उठाया गया। पैराग्राफ में एक गौरव नाम के बंदे का जिक्र है जिसे आप खुद पढ़ सकते हैं। खबर का लिंक भी दिया है। क्लिक कर देख सकते हैं।

Among those falsely implicated are some youths between the age of 18 and 25. Raj Kumar Singh, a resident of Lank village, has submitted an application to the police that his son Gaurav, who has been selected provisionally as a soldier, was falsely implicated. The complainants were jealous of his son's achievement, he claimed.

(इस बात की केवल संभावना (पुष्टि नहीं) है कि मंत्री जी जिस गौरव से मिले उसी गौरव से जुड़ी खबर का पैराग्राफ व लिंक आपको दिया गया है।)  

(11 दिसंबर 2013)

पुलिस की मुसीबत बढ़ा सकती है फर्जी नामजदगी ( दैनिक जागरण) 20 सितंबर 2013
ये रहा लिंक..(इसे कॉपी कर एड्रेस बार में पेस्ट करें)
http://www.jagran.com/uttar-pradesh/muzaffarnagar-10738154.html

कई मामले ऐसे थे जिनमें वादी ने ही खुद  बताया कि उनके यहां कोई घटना नहीं हुई। कुछ मामलों में बयान गलत मिले और कई आरोपियों पर आरोप गलत मिले, ऐसे करीब 100 मामलों पर एक्सपंज रिपोर्ट लगाई गई है।  (दैनिक जागरण 7 सितंबर 2014)
ये रहा खबर का लिंक..(इसे कॉपी कर एड्रेस बार में पेस्ट करें)
http://www.jagran.com/uttar-pradesh/muzaffarnagar-11613048.html

मुजफ्फरनगर दंगों में फर्जी केस किस हद तक दर्ज हुए थे उसका अंदाजा आप अमर उजाला की एक खबर को पढ़कर लगा सकते हैं। ख़बर का लिंक भी साथ दिया गया है।

10 दिसंबर 2013, अमर उजाला

“मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान दर्ज कराए गए मुकदमों में बड़ी तादाद ऐसे लोगों की भी है, जिन्होंने महज गुस्से अथवा किसी के बहकावे में आकर फर्जी रिपोर्ट दर्ज करा दी।सोमवार को ऐसा ही मामला आईजी आशुतोष पांडेय के सामने आया, जब गांव बहावड़ी निवासी एक वृद्ध ने अपने तीन मुकदमों को फर्जी बताते हुए इन्हें खत्म करने की गुहार लगाई।

सोमवार को पुलिस लाइन में आईजी से मिलने पहुंचे गांव बहावड़ी निवासी अब्दुल रहमान ने फर्जी मुकदमे दर्ज कराने की जानकारी दी। अब्दुल रहमान का कहना था कि दंगे के दौरान वह परिवार समेत कैराना के राहत शिविर में रहने चला गया था।

वहां पहुंचकर गुस्से और लोगों के बहकावे में आकर उसने गांव बहावड़ी निवासी कई लोगों के खिलाफ फर्जी रिपोर्ट दर्ज करा दी। इसके साथ ही उसके बेटों नसीम और इसरार ने भी कई लोगों के खिलाफ फर्जी रिपोर्ट दर्ज करा दी, जबकि उनका दंगे में कोई नुकसान नहीं हुआ था।

अब्दुल रहमान ने आईजी से फर्जी मुकदमे दर्ज कराने के लिए माफी मांगते हुए इन मुकदमों को खत्म कराने की गुहार लगाई। अब्दुल रहमान का कहना है कि दंगों के बाद भले ही मामला शांत हो गया हो, लेकिन अब वह गांव लौटना नहीं चाहता।

आईजी ने एसआईटी के एएसपी मनोज कुमार झा को मामले की जांच कर फर्जी मुकदमे खत्म करने के निर्देश दिए हैं। 

वोटर लिस्ट देख किए गए नामजद

अब्दुल रहमान ने दंगे के मुकदमों में बड़े पैमाने पर की गई फर्जी नामजदगी की भी पोल खोली है। अब्दुल का कहना है कि उसने तो अपनी रिपोर्ट में गांव के केवल तीन लोगों के ही नाम दिए थे।

जिस शिविर में उसने शरण ली थी, वहां मौजूद कुछ लोगों ने उसे कंप्यूटर पर गांव बहावड़ी के लोगों की लिस्ट दिखाई और फिर उसमें से दस से अधिक लोगों को फर्जी तरीके से नामजद कर दिया गया।

वृद्ध का कहना था कि यही प्रक्रिया उसके बेटों द्वारा दर्ज कराए गए मुकदमों में भी अपनाई गई थी।” 


उपर्युक्त तथ्यों  को ध्यान में रखते हुए  ऐसा लगता है कि मंत्री महोदय को ये विश्वास है या दिलाया जा रहा है या  कि वो जिन आरोपियों से मिलने गए थे वे निर्दोष हैं। शायद यही वजह हो सकती है कि एक संवैधानिक पद पर आसीन होने के बावजूद भी मंत्री महोदय दंगे के आरोपियों से मिले। हमें, मंत्री के जेल जाकर आरोपियों से मिलने की खबर के इस पहलू पर भी नजर रखनी होगी क्योंकि अभी आरोप साबित नहीं हुए हैं लिहाजा उन्हें अपराधी भी नहीं माना जा सकता। हां अगर आरोप सिद्ध होते हैं तो मंत्री जी को फिर देश से माफी मांगनी होगी और अगर वो ऐसा नहीं करेंगे तो उनकी नीयत पर सवाल खड़े होंगे। लेकिन ये सब बात की बातें हैं

Friday, November 27, 2015

उजाड़कर रख देंगे इस बाग को - मुस्लिम धर्मगुरू

(इस वीडियो का लिंक शेयर करने का मकसद आपको जागरूक करना है न कि आपको गुस्सा दिलाना या भड़काना क्योंकि हर मुस्लिम या मुस्लिम धर्मगुरू न ऐसा सोचता है और न ही ऐसे आग उगलता है। इसलिए किसी भी तरह से भड़कने की बजाय सिर्फ ठंडे दिमाग से सोचिए कि हम अपने देश को एक बेहतर देश कैसे बना सकते हैं जिसमें हर कोई सुख और शांति से रह सके और हमारा ये देश दिन दूनी और रात चौगुनी तरक्की करे।)

कोई मुसलमान अमनपसंद नहीं है..  ये मैं नहीं कह रहा हूं  बल्कि ये  दावा तो करीब  एक साल पहले(13/12/2014) मुरादाबाद जिले में खुद एक मुस्लिम  धर्मगुरु..  द्वारा किया जा चुका है। वीडियो का लिंक नीचे दिया जा रहा है। क्लिक करे और खुद देखें सुने। वीडियो में जो कहा गया है उसे मैंने उन लोगों के लिए लिख भी दिया है जिनके पास वीडियो सुनने की सुविधा नहीं होगी। लेकिन दावा करने वाले शख्स  के यक़ीन, नफरत भरे तेवर व जोश का अंदाजा लगाने के लिए वीडियो को देखना ही नहीं बल्कि सुनना भी जरूर चाहिए। वीडियो में जो बातें कही गई हैं वो धर्मांतरण के चलते कही गई हैं। एक बार फिर से याद दिला दूं कि वीडियो का लिंक शेयर करने का उद्देश्य आपको भड़काना हरगिज नही है। हां..ठहाका लगाने की पूरी छूट है।
वीडियो का लिंक ये है..


वीडियो में जो कुछ कहा गया है वो इस प्रकार है..

सुन लो कान खोल के..कान खोल के सुन लो.. तारीखों की एजेंसिया..और तमाम वो लोग जिनके हाथों में शकीन है...कसम उस पूरा रमीन की... हमारे हाथ में भी हर हथि..हथियार आ सकता है,  अगर हम चाहे तो..हर हथियार आ सकता है...हर हथियार आ सकता है ...उजाड़ कर रख देंगे इस बाग को.. खत्म कर देंगे इस ???? तमाम को.. कैसा पार्लियामंट..कैसी असेंबली..मिस्टर..मिस्टर यादव..मिस्टर..मुलायम सिंह यादव...और मिस्टर अखिलेश सिंह यादव सिंह सुन लो कान खोल के.. अगर तुमने जल्द से जल्द इस पर पाबंदी नहीं लगाई तो भी असेंबली के अंदर घुस जाएंगे और तुम्हारी सारी कुर्सी मेजे तोड़ कर फेंक  देंगे.. अपना कानून चलाएंगे..और मोदी जी सुन लो इस बात को कि जिस दिन ये काफिला.. मुजाहिद्दीन का..दिल्ली चला गया उस दिन पालिर्यामंट साबुत नहीं रहेगा..कोई कुर्सी साबुत नहीं रहेगी..कोई वहां का एमपी-एमएलए साबुत नहीं बचेगा..कत्लोगारदगरी हो जाएगी..बच नहीं सकता किसी कीमत पर भी इस हिंदुस्तान का नक्शा..हजारो टुकड़े हो जाएंगे इस देश के..कैसी सलामती..कोई मुसलमान अमनपसंद नहीं चाहता यहां पे..हम कोई अमनपसंद नहीं हैं..हम इस्लाम के सच्चे मुजाहिद हैं। मुजाहिद रहेंगे और मुजाहिद मरेंगे।

(जो कुछ कहा गया है उसे ज्यों का त्यों रखने की भरसक कोशिश की गई है। फिर भी किसी भी तरह के भ्रम से बचने के लिए खबर से संबंधित वीडियो देखें।)


नीचे दिए लिंक पर कथित मुस्लिम धर्मगुरु के इस भड़काऊ भाषण से संबंधित खबर पढ़ सकते हैं। 



इस भड़काऊ भाषण के संबंध में कुछ खास बातें..
    
    1- ये भाषण करीब 1500 लोगों की भीड़ में दिया गया।
    2- भाषण देने वाले  कथित धर्मगुरु के यक़ीन, नफरत भरे तेवर और जोश गौर करने लायक हैं।
    3- भाषण की वजह धर्मांतरण है।
    4- भाषण देने वाले धर्मगुरु के खिलाफ कोई कार्रवाई करने की कोई सूचना  संज्ञान में नहीं है।
    5- भाषण में आग उगलने वाले इस शख्स पर कोई बड़ा ऐतराज सामने नहीं आया है।
    6- गौर करने वाली बात ये है कि मामले से संबंधित पूरा वीडियो उपलब्ध नहीं है। इसलिए और
      क्या कहा गया था उसका सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है।
    7- 1500 लोगों की भीड़ में भाषण के वक्त प्रशासनिक व पुलिस अधिकारी भी मौजूद थे।
    8- मुरादाबाद जिले में बाबरी मस्जिद ऐक्शन कमिटी के कार्यक्रम में ये भाषण दिया गया था।
    9- भाषण के वक्त शहर इमाम और बाबरी मस्जिद ऐक्शन कमिटी के अध्यक्ष भी मौजूद थे।


इस वीडियो का लिंक शेयर करने का मक्सद सिर्फ इतना है कि हर भारतवासी को हर समय सावधान व सचेत रहने की आवश्यकता है न कि भड़कने या भड़काने की। छोटी-2 बातों पर आपको गलत रास्ते पर धकेलने वाले लोग कदम-2 पर मिल जाएंगे लेकिन आपको सावधान रहने की जरूरत है। वहीं देश व राज्य सरकारों को भड़काऊ भाषण देने वाले ऐसे हर शख्स पर कड़ी कार्रवाई करने की आवश्यकता है ताकि दूसरा कोई भी ऐसी बातें करने की हिम्मत न कर सके।    
     


Tuesday, August 4, 2015

दुर्लभतम मामलों में मृत्युदंड अनुचित कैसे?






                                      

                                   च्रित्र गुगल से साभार


याकूब मेमन की फांसी के साथ ही सज़ा-ए-मौत के औचित्य को लेकर ज़बरदस्त बहस छिड़ गई है। हालांकि पहले भी समय-2 पर फांसी की सज़ा ख़त्म करने की मांग होती रही है। लेकिन इस बार याकूब की फांसी पर अभूतपूर्व विवाद हुआ है जिसके चलते मौत की सज़ा देने का ज़ोरदार विरोध ज़ोर पकड़ रहा है। वैसे फांसी की सजा देना जारी रखने के हिमायती भी कम नहीं हैं जिसमें ये ब्लॉग लेखन प्रशिक्षु भी शामिल है। विरोधी तर्क दे रहे हैं कि जब संसार के कई देशों में मौत की सजा के प्रावधान को हटा दिया गया है तो भारत में भी मौत की सजा के प्रावधान को ख़त्म कर देना चाहिए। इस तर्क के संदर्भ में इतना कहना है कि भारत और उन देशों के हालातों में धरती-आसमान का अंतर हैं। भारत में हर साल कई लोग बेवजह कई तरह की हिंसा का शिकार हो जाते है जिसका दूरगामी और गहरा असर होता है। इस बेवजह की हिंसा पर प्रभावी रोक लगाने और इसके पीड़ितों को न्याय देने के लिए ही सज़ा-ए-मौत देने का प्रावधान भारत में है। कौन इंकार करेगा कि भारत आतंकवाद से पीड़ित राष्ट्र नहीं है? ये वो देश है जो हर वक्त आंतकियों के निशाने पर है। दूसरे बड़े पैमाने पर निज़ी स्वार्थों के चलते सांप्रदायिक और दूसरी तरह की हिंसा भी होती है। कुलमिलाकर हालात ऐसे हैं कि मिसाल मिलना भी मुश्किल है। जाहिर है कि किसी भी तरह की हिंसा के पीड़ित को न्याय देना राष्ट्र का कर्तव्य है। इसलिएन्याय की तराजू के पलड़ों में संतुलन बनाए रखने के लिए  दुलर्भतम मामलों में फांसी की सजा का प्रावधान भी कर रखा है जिसे केवल भावनाजनित आधारों पर खारिज नहीं किया जा सकता।

सजा-ए-मौत के विरोधी कहते हैं कि आधुनिक समाज में फांसी सही नहीं हैइस तर्क का उत्तर ये है कि आधुनिक समाज में तो बॉम्ब ब्लास्ट कर बर्बरता से निर्दोष लोगों की जान लेना और उनके परिजनों को कभी न भरने वाले जख्म औरपीड़ा देना भी सही नहीं है। या है? जो लोग अपना एजेंडा लागू करने के लिए बड़ी संख्या में निर्दोषों की जान लेते हैं तो राष्ट्र का कर्तव्य बन जाता है कि वो ऐसे तत्वों को उचित दंड देने के साथ ही पीड़ितों को न्याय भी सुनिश्चत करें। न्याय के लिए फांसी भी देनी पड़े तो भी दी जाए।  कुछ लोग फांसी की सजा का प्रावधान होने के बावजूद भी गंभीर किस्म के अपराधों में कोई कमी नहीं आने का दावा कर सजा-ए-मौत का विरोध कर रहे हैं। उनको जवाब ये है कि ये कैसे मान ले कि मौत की सजा के प्रावधान सेगंभीर किस्म के अपराधों में कोई कमी नहीं आई?  ऐसा भी हो तो सकता है कि अपराधी निश्चित थे कि वो हर हाल में फांसी से बच जाएंगे  इसलिए अपराधों को अंजाम देते रहे? वहीं ये भी संभव है कि अगर फांसी  की सजा का प्रावधान न होता तो गंभीर किस्म के अपराध और भी बड़े पैमाने पर हुए होते?  वैसे तथ्य ये है कि फांसी की सजा केवल अपराध कम करने के लिए नहीं दी जाती न्याय सुनिश्चित करने के लिए दी जाती है।

एक तर्क ये दिया गया है कि जिस देश में जीव हत्या तक को सबसे बड़ा पाप माना जाता है उसे देश में फांसी की सजा देना कहां तक उचित हैं? इस तर्क का जवाब ये है कि निर्दोष जीवों की हत्या को पाप माना जा सकता है लेकिन हिंसक जानवरों के संदर्भ में ऐसा नहीं देखा गया है। कई बार उनको गोली भी मारनी पड़ती है। दलील ये भी दी जा रही है कि मौत की सजा के हकदार अपराधियों की जान लेने की बजाय उनके सुधार की बात होनी चाहिए?  इस संबंध में ऋषि वाल्मीकि और अंगुलीमाल का संदर्भ दिया जा रहा है। दोनों के बारे में माना जाता है कि पहले डाकू थे लेकिन बाद में वाल्मीकि कठोर तप कर ऋषि बन गए थे और अंगुलीमाल भगवान बुद्ध की शरण में आ गए थे। लिहाजा ख़तरनाक़ अपराधियों में भी ऐसे सुधार का प्रयास होना चाहिए न कि फांसी दी जाए?

मेरे हिसाब से तो वाल्मीकि और अंगुलीमाल का संदर्भ देना गलत है क्योंकि दोनों के बारे में निश्चित तौर पर कुछ भी न नहीं कहा जा सकता? दूसरी बात दोनों संदर्भ प्राचीन समय से उठाए गए है। आधुनिक समय के मुद्दों पर चर्चा के लिए आधुनिक प्रसंग उदाहरण के लिए दिए जाए तो बेहतर रहता।
फिर भी ऋषि वाल्मीकि जीवन निर्वाह के लिए डाकू बने थे। जिस दिन उनकी पत्नी ने कहा कि आपके पापों में हम भागीदार नहीं बनेंगे तो उनकी आंखें खुल गई और वो तपस्या करने चले गए। कठोर तप के बाद वो ऋषि बन गए। लेकिन सवाल यहां भी है। क्या ऋषि वाल्मीकि के पीड़ित कभी उन्हें माफ कर पाए होंगे? क्या उन्होंने ये स्वीकारा होगा कि उनके साधू बन जाने से वो खुश है? उनके पीड़ितों को कितने कष्ट भोगने पड़े होंगे ये सच्चाई नहीं बदल जाती? अंगुलीमाल के विषय में भी यही कहा जा सकता है। अब सवाल ये है अगर वाल्मीकि और अंगुलीमाल  का उदाहरण देना  उचित है तो फिर महाबली बाली का उदारण देना क्यों अनुचित होगा जिसे इसलिए धोखे से मृत्यु दंड दिया गया क्योंकि उसने छोटे भाई की पत्नी को जबरदस्ती अपनी पत्नी बनाकर रखा जो कि श्री राम के दृष्टिकोण में ऐसा पाप था जिसे करने वाले को प्राण दंड देने में कोई पाप नहीं था। दिलचस्प तथ्य ये भी है कि वाल्मीकि ने भी अपनी रामायण में कहीं भी बाली को प्राण दंड देने के लिए श्री राम को गलत नहीं बताया है बल्कि आदर्श पुरुषोत्तम राम बताया गया है। यानि प्राण दंड को स्वीकारा गया है।  

फांसी दिए जाने के विरोधियों ने और भी बहुत से सवाल उठाए हैं। उन सबके उत्तर में कहना चाहूंगा कि जरा सोचिए अगर किसी क्रूर मानसिकता के आदमी की वजह से मेरे सारे प्रियजन व परिजन बेमौत खौफनाक़ मौत मारे गए हो तो मुझे क्या करना चाहिए? क्या मुझे न्याय नहीं मांगना चाहिए? कृत्य इतना घिनौना व पीड़ादायक है कि दोषी की जान लेने पर ही माना जाएगा कि न्याय हुआ? न्याय जरूरी है उनके लिए भी जो जीना चाहते थे लेकिन ऐसी मौत मरे जो दुश्मन को भी नसीब न हो, न्याय जरूरी ताकि इस सुकून के साथ बाकी जीवन जी सकूं कि चलो जिसने मेरे प्रियजन मुझसे छीने उसे भी उसके कर्मों की सजा मिली? लेकिन उस हत्यारे को मौत की सज़ा न देकर उसको सुधरने का मौका दिया जा रहा है? हो सकता है कि वो सुधर जाए लेकिन ऐसी दशा में जो लोग बेमौत खौफनाक मौत मरे क्या उनके साथ न्याय हुआ? क्या जीवित बचे सदस्य/सदस्यों के साथ न्याय हुआ जो जीवन भर अपनों की याद में तड़फने को मजबूर है? पीड़ितों के प्रति हमने जिम्मेदारी निभाई?

सज़ा-ए-मौत देने के विरोधियों को याद रखना चाहिए कि हमारे देश में फांसी की सज़ा का प्रावधान दुर्लभतम मामलों में है।यानि जहां दोषी का अपराध इतना क्रूर और खौफनाक़ है कि मिसाल देना मुश्किल है। ख़ैरात में मौत की सज़ा देने का प्रावधान नहीं जिसके लिए इतना हंगामा मचाया जाए?