Monday, March 25, 2019

लोगों की चिंताएं हरिए, अपनी जेबें भरिए!

बचपन से सुनते आए हैं कि चिंता, चिता समान है! लेकिन किसी ने आज तक नहीं बताया कि लोगों की चिंता करना तो किसी वरदान से कम नहीं है! लोगों की चिंता में अपनी नींद खराब करने वालों की जेबें लालाजी के पेट की तरह फूली होती हैं और जिसकी जेब मोटी हो उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता! उदाहरण के लिए कोई भी पॉकेटमार अपनी चिंता कभी नहीं करता! उसे  केवल लोगों के बटुओं की चिंता होती है! उसकी चिंता कमाल करती है! वो लोगों की पॉकेट उड़ा लेता है और संतोष की सांस लेता है! अपना मनपसंद भोजन करता है! चादर तानकर सोता है! सुबह अंगड़ाई लेते हुए उठता है। नाश्ता करता है और फिर से लोगों की पॉकेट की चिंता शुरू कर देता है! इस प्रकार लोगों की चिंता करते-करते वो बड़े आराम से दिन- महीने- साल गुजारता है! 

बहुत सारे लोग बड़े स्तर पर लोगों की चिंता करते हैं! कई-कई प्रकार से चिंता करते हैं! इसलिए इनकी  जेबें ही नहीं बल्कि बैंक बैलेंस भी मोटा होता है! साथ में चमचमाती गाड़ियों का जखीरा होता है! ये दूसरों को भी प्रेरित करते हैं कि हमारी तरह तुम भी लोगों की चिंता करो! जो बहुत अच्छे से लोगों की चिंता करते हैं उनको काम पर रखते हैं! इसके लिए बाकायदा मासिक वेतन देते हैं!अतिरिक्त सुविधाएं भी देते हैं! इस कैटेगरी में तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी आती हैं जो लोगों की चिंता करते-करते अरबों - खरबों का बिजनिस करने लगी हैं! 


अपने नेताओं की अपार सफलता के पीछे भी लोगों की चिंता यानी उनके कल्याण का विज्ञान छिपा है। नेता, बचपन से ही लोगों की चिंता करने लगते हैं! मां-बाप का पैसा बचाने के लिए वो पढ़ाई नहीं करते! दूसरों के माल पर मौज उड़ाना शुरू कर देते हैं ताकि मां-बाप की रही-सही चिंता भी खत्म हो जाए! युवा होते-होते वे आत्मनिर्भर हो जाते हैं! जो युवा नेता अत्यधिक होनहार होते हैं वे अतिरिक्त सुख-सुविधाएं भी जुटा लेते हैं! बड़े होने तक यह बात पूरी तरह समझ चुके होते हैं कि लोगों की चिंता करके ही अपने आपको चिंता मुक्त रखा जा सकता है! इसलिए मौक़ा मिलते ही लोगों की चिंता झपट लेते हैं! उसे अपना बना लेते हैं! मान लो कोई युवा नौकरी को लेकर चिंता में है तो युवा  नेता उससे कहेगा कि तुम नौकरी की चिंता कतई न करो। आज से तुम्हारी नौकरी की चिंता मेरी चिंता! तुम बस चार-पांच लाख रुपयों का जुगाड़ करो। बाकी सब मैं देख लूंगा। युवा तत्काल अपनी चिंता युवा नेता को सौंपकर चिंतामुक्त हो जाता है! हंसते-मुस्कराते चार-पांच लाख रुपये युवा नेता को सौंप देता है! दूसरों की चिंता के नाम पर युवा नेता ने चार-पांच लाख झटक लिए। केवल एक बेरोजगार युवा की चिंता को अपनाकर इतना कमा लेना कम नहीं है!

आगे जाकर युवा नेता चुनाव लड़ता है। वो लोगों को भरोसा देता है कि कैसे उसने दूसरों की चिंता को अपनी चिंता समझा है।बेरोजगारों को नौकरी दिलाई है! अगर वो जीता तो उसकी जीत में लोगों की जीत है! उसकी हार में लोगों की हार है! इसलिए मुझे जिताइए! अपनी चिंताएँ मुझे दान कर दीजिए! मैं आपकी चिंताएं दूर करुंगा! युवा नेता चीख-चीख कर जनता से कहता है कि वो अपनी चिंताएं उसके नाम कर दे! जनता तुरंत युवा नेता की बात मान लेती है। अपनी चिंताएं उसे अपर्ण कर देती हैं! उसे अपना बहुमूल्य वोट देकर अपना प्रतिनिधि चुनती है। युवा नेता जनता का युवा प्रतिनिधि बन जाता है। कुछ ही सालों में युवा प्रतिनिधि के साथ-साथ उसके परिजनों और रिश्तेदारों तक की जेबें और बैंक खाते इतने मोटे हो जाते हैं कि उनकी सात पुश्तों तक को कुछ भी करने की जरूरत नहीं पड़ती है! 

युवा नेता जब युवा नहीं रहता और थोड़ा अनुभवी हो जाता है तो वो अपनी क्षेत्र के साथ-साथ पूरे देश की चिंता करने लगता है! पूरे देश की चिंता को अपनी चिंता समझने लगता है। वो ऐसा तब तक करता जब तक कि वो पूरे देश का मंत्री बन नहीं जाता है! मंत्री बनते ही वो स्विस बैंक में खाता खोलता है। देश-विदेश में प्रोपर्टी बनाता है। इस प्रकार दूसरों की चिंता करते-करते वो नेता अपने सारे सपने पूरे करता जाता है।

तमाम युवा सारी जवानी एक सरकारी नौकरी की  तैयारी करते करते उम्रदराज और गंजे तक हो जाते हैं लेकिन नौकरी नहीं मिलती। जीवन यापन का सवाल खड़ा हो जाता है। थोड़ा चिंतन करने बाद तय करते हैं कि हमें भले ही  नौकरी न मिली हो लेकिन दूसरे युवाओं को बेकार नहीं रहने देंगे! युवाओं के भविष्य की चिंता करते हुए उन्हें कोचिंग देनी शुरू कर देते हैं और अपनी जीवन यापन का सवाल झटके में हल कर लेते हैं!  

इस चर्चा से यह शिक्षा मिलती है कि लोगों की चिंताओं को अपनी चिंता बनाओ। उन चिंताओं के समाधान के नाम पर आगे बढ़ो। इसके बाद फिर कभी पीछे मुड़कर देखने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। तमाम अरबपतियों-खबरपतियों की कार्यप्रणाली की रिसर्च करने के  बाद यही  निष्कर्ष निकलता है। बाबा रामदेव ने भी यही किया है। लोगों के स्वास्थ्य की चिंता करते-करते आज करोड़ों-अरबों का व्यापार करने लगे हैं। शुरू में बाबा ने अवश्य ही बड़े-बड़े हॉस्पिटलों की कमाई पर रिसर्च की होगी। बाबा अक्सर कहते भी हैं कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने देश में लूट मचा रखी है। बाबा की बात माने या न माने यह आप पर है। सभी राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सफलता का राज यही है। सबने लोगों से कहा कि हमें आपकी हर प्रकार की जरूरत की चिंता है। आप बस दिन-रात पैसा कमाने पर ध्यान दें। अपनी चिंताएं हम पर फेंक दें। हम उनका न केवल ख्याल रखेंगे बल्कि सम्मान भी करेंगे! हिसाब लगा तो आपकी चिंताओं को सम्मानित भी करेंगे। इस प्रकार जिसने भी लोगों की चिंताओं का सम्मान किया, दुनिया ने उनका जबरदस्त (कभी-कभी जबरदस्ती) और भरपूर सम्मान किया है।

लोगों की चिंता कर- कर अपनी आने वाली पीढ़ियों तक की चिंता दूर करने की कथा अनंत है। लिहाजा बात यहीं पर ख़त्म करते हैं!
       

Monday, March 18, 2019

रंग चढ़े जब फागुन का


फागुन में बौराने या फगियाने का भी अपना एक अलग ही आनंद है! फागुन यानी वसंत ऋतु का महीना।    फागुन में इंसान बिना विटामिन की गोली निगले भी युवा और तरोताज़ा महसूस करने लगते हैं। नित्य शाम-सवेरे शक्तिवर्द्धक चूर्ण का सेवन किए बिना ही घोड़े जैसी फुर्ती से दौड़ने लगते हैं, उछल-उछल कर चलते हैं! बिना क्रीम पाउडर लपेटे ही चेहरा धूप में रखे स्टील के बर्तनों की तरह चमचमाता है! यह फागुन का असर है कि अल्पकाल के लिए गंजों को भी बालों की कमी नहीं खलती! लड़कियां अपनी सहेलियों की सुंदरता से नहीं जलती! कौवे जैसे बेसुरे  प्राणी भी कोयल जैसा मीठा बोलने लगते हैं! बूढ़ों पर फागुन का अच्छा-सच्चा-कच्चा-पक्का असर होता है! बूढ़ों पर जवानी छाने की सबसे अधिक दुर्घटनाएं फागुन में ही होती हैं! नौजवान भी मौक़ा मिलते ही चौका मारने की ताक में रहते हैं! जहां तक कवियों की बात है तो इस प्रजाति के जीव शृंगार रस की कविताओं का सृजन कर अपने-अपने मनोभाव प्रकट करते हैं!

फागुन का प्रभाव ऑफिसों में न हो ये हो नहीं सकता! वहां का वातावरण भी हल्का-फुल्का हो जाता है। बॉस और उसके मातहतों के बीच संवाद में प्रेम रस उत्पन्न होने लगता है। कड़वाहट, सर्दी की तरह कम होने लगती है। प्रमोशन के अवसर ऐसे ही बढ़ने लगते हैं जैसे धीरे-धीरे दिन बढ़ रहा होता है। 

फागुन में उमंग और उत्साह का राज होता है। यह माह प्रेमियों के लिए भी बहुत अनुकूल होता है। प्रेम स्वीकृति की संभावना भी अधिक होती है! नये-नये पत्तों से सजे पेड़-पौधे नयनों को भाते हैं। रंग-रंग के फूल हृदय लुभाते हैं! प्रेम करने या प्रदर्शित करने के लिए इससे बढ़िया मौसम और कोई नहीं हो सकता! फागुन में प्रकृति का हर रूप शृंगार रस के लिए उद्दीपन का कार्य करता है।

फागुन में  होली आती है। होली में चमत्कार होता है! दुश्मन भी दोस्त बनकर गले लग जाता है! उम्र भले ही पचपन की हो दिल बचपन का हो जाता है। बूढ़ों के मन में  तरंग उठती है! उमंग पैदा होती है। होली में अबीर होता है, रंग होता है! गीत-संगीत होता है। जमकर धमाल और हुड़दंग होता है। रंग-बिरंगे चेहरे देखकर हर कोई दंग होता है! स्वादिष्ट पकवान होते हैं। पकवानों की नानी गुझिया होती है और खाने की भी मनाही नहीं होती। 

होली के साथ ही फागुन की विदाई हो जाती है और बस याद रह जाती है। जल्द ही गर्मी दस्तक देने लगती है! अब वंसत को भी बोरिया विस्तर बांधना पड़ता है! जीवन के एक और वसंत के खर्च हो जाने का पता तक नहीं चलता! प्रकृति का यही नियम है! मौसम के बाद मौसम आता है, जाता है लेकिन पता नहीं चलता।  


                                                                                                              -वीरेंद्र सिंह
  

Wednesday, March 13, 2019

पत्ते से जीना सीखें




शाखा पर लगा पत्ता
अपने संगी संग
मस्त रहता है
दिन-रात
हर मौसम में
बिना ग्लानि
बिना  असंतोष
सब सहता है
गिरने के भय बिना 
हिलता -डुलता है
हवा के वेग से झूमता है
एक  ही स्थान पर दृढ़ 
अपने साहस के 
सभी प्रमाण देता है
फिर एक दिन 
डाल से अलग होता है
मिट्टी में मिल जाता है
किंतु पहले पूरा जीता है
कहने को  पत्ता है
किंतु सही अर्थ में
हमें सिखाता है
अनमोल जीवन
ऐसे जिया जाता है!
ऐस जिया जाता है!
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            वीरेंद्र सिंह
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Wednesday, March 6, 2019

मध्यस्थता से हल होगा अयोध्या मामला?

बुधवार (6 मार्च, 2019) को सुप्रीम कोर्ट ने  राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को मध्यस्थता के जरिए सुलझाने के संबंध में अपना आदेश सुरक्षित रखा है। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में मामले की सुनवाई कर रही संविधान पीठ ने संबंधित पक्षों  की  दलीलों को ध्यानपूर्वक सुनने के  बाद कहा कि  मध्यस्थता को लेकर  फैसला बाद में सुनाया जाएगा। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायधीश ने संबंधित पक्षों से से कहा था कि अगर वे चाहें तो मध्यस्थों का नाम भी दे सकते हैं। मामले में पक्षकार निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड ने मध्यस्थता के जरिए मामले को सुलझाने का पक्ष लिया है तो वहीं अन्य पक्षकार हिन्दू महासभा ने साफ़ कहा कि मामले को मध्यस्थता के लिए न भेजा जाए। रामलला विराजमान की और से भी कहा गया है कि अतीत में मध्यस्थता की कई कोशिशें विफल हो चुकी हैं। ये दलील भी दी गई कि राम का जन्म अयोध्या में हुआ इस पर कोई विवाद नहीं है। विवाद ये है कि राम जन्म स्थान कहा हैं और ये बात मध्यस्थता से तय नहीं की जा सकती सुप्रीम कोर्ट के रुख से तो ऐसा लगता है कि उसे मध्यस्थता से मामले के समाधान की कुछ न कुछ उम्मीद जरूर है। सुनवाई में उत्तर प्रदेश सरकार का पक्ष रख रहे सोलिसिटर जनरल, तुषार मेहता न कहा कि कोर्ट इस मामले को मध्यस्थता के लिए तभी भेजे जब इसमें मध्यस्थता की गुंजाइश दिखती हो।

 संवेदनशील है मामला

कोर्ट ने माना है कि मामला बहुत ही संवेदनशील और गंभीर है। इसलिए सुनवाई के आरंभ में ही स्पष्ट कर दिया था कि वो इस बात पर फैसला करेगा कि समय बचाने के लिए केस को कोर्ट की निगरानी में मध्यस्थता के लिए भेजा जा सकता है या नहीं।


मध्यस्थता से मामले का सुलझना मुश्किल

बहस के दौरान जो दलीलें दी गई हैं उनसे साफ़ है कि मामले में हिंदू पक्षकारों(निर्मोही अखाड़े को छोड़कर) को नहीं लगता कि राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिस विवाद मध्यस्थता के जरिए सुलझ सकता है। इसके पीछे ठोस कारण भी हैं। दरअसल अतीत में  इस मामले को सुलझाने के जितने भी प्रयास हुए हैं वे सब निष्फल रहे हैं। लिहाजा अगर सुप्रीम कोर्ट अपनी निगरानी में मध्यस्थता के जरिए मामले को सुलझाने के पक्ष में भी फैसला देता है तो इस बात की संभावना कम ही है कि मामला सुलझ जाएगा। मुस्लिम पक्षकार , सुन्नी वक्फ बोर्ड ने भले ही मध्यस्थता का समर्थन किया हो लेकिन बाबरी मस्जिद पर उसके रुख में  नरमी आएगी इसकी संभावना बेहद कम है और जब तक कोई पक्ष नरम नहीं पड़ेगा तब तक मसला सुलझेगा नहीं। बीजेपी के वरिष्ठ नेता सुब्रमणियन स्वामी ने कोर्ट में कहा है कि अयोध्या में विवादित जमीन सरकार की है। उन्होंने 1994 में पीवी नरसिंहाराव  सरकार के वादे की भी याद दिलाई।श्री स्वामी ने कहा कि 1994 में राव सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि कभी ये पाया गया कि विवादित जमीन पर मंदिर था तो जमीन मंदिर निर्माण  के लिए दे दी जाएगी। 


कोर्ट के फैसले पर सबकी निगाहें

अब सबकी निगाहें कोर्ट के फैसले पर हैं। सुप्रीम कोर्ट मामले को अपनी निगरानी में मध्यस्थता के लिए भेज भी देता है तो इस बात की गुंजाइश बेहद कम है कि मामला सुलझ जाएगा। जैसा कि ऊपर भी लिखा जा चुका है कि जब तक एक पक्ष अपने रुख में नरमी नहीं लाएगा तब तक कुछ हासिल नहीं होने वाला। अगर मध्यस्थता के जरिए ही ये मसला हल होता तो अब तक कब का हल हो चुका होता! यही वजह है कि मध्यस्थता को लेकर सभी पक्ष सहमत नहीं हैं। बीजेपी नेता सुब्रमण्यन स्वामी ने अपने एक ट्वीट में लिखा है कि मामले में मध्स्थता एक बेकार की कवायद है। बता दूं कि सुब्रमण्यन स्वामी ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल कर रखी है। 

                                                                                             -वीरेंद्र सिंह
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Sunday, March 3, 2019

बसंत को आने दो।



बारिश बड़ी नादान तुम
बसंत के मौसम में
बिन बुलाई मेहमान तुम

बार-बार आ जाती हो
नहीं किसी को भाती हो
अब करो प्रस्थान तुम
बारिश बड़ी नादान तुम
बसंत के मौसम में
बिन बुलाई मेहमान तुम

बसंत को आने दो
कोयल को गाने दो
सुनने दो फाल्गुनी हवा का गान तुम 
बारिश बड़ी नादान तुम
बसंत के मौसम में
बिन बुलाई मेहमान तुम

सावन में आना
झम झमाझम गाना
अभी करो विश्राम तुम
बारिश बड़ी नादान तुम
बसंत के मौसम में
बिन बुलाइ मेहमान तुम

खेतों में सरसों पीली-पीली
पानी से मिट्टी गीली-गीली
सबको कर रही हैरान तुम
बारिश बड़ी नादान तुम
बसंत के मौसम में 
बिन बुलाई मेहमान तुम


        - वीरेंद्र सिंह
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Tuesday, February 26, 2019

पुलवामा हमले का जवाब


आख़िरकार वह वक़्त आ ही गया जब भारत के सब्र का बांध टूट गया। भारतीय वायु सेना का पाकिस्तान में घुसकर जैश ए मोहम्मद के अड्डों को तबाह करने में कुछ भी अप्रत्याशित नहीं है। इसकी उम्मीद उसी दिन से होने लगी थी जब 14 फरवरी को जैश ए मोहम्मद के  सरगना मसूद अजहर के इसारे पर एक आत्मघाती हमलावर ने सीआरपीएफ के काफिले पर हमला कर दिया थ जिसमें 40 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे।
पुलवामा आतंकी हमले के 12 दिन बाद बाद 26 फरवरी की  भारतीय वायु सेना(Indian Air force) ने  तड़के करीब साढ़े तीन बजे पाकिस्तान में घुसकर जैश ए मोहम्मद के ठिकानों पर हमला कर उन्हें तबाह कर दिया। बालाकोट नामक जिस स्थान पर हमला हुआ है उसे आतंकवादियों का गढ़ माना जाता है। बालाकोट, एलओसी से तकरीबन 80 किलोमीटर दूर है। भारतीय वायुसेना की इस साहसिक कार्रवाई से पाक में हड़कंप मचना लाजिमी था। उम्मीद के मुताबिक वायु सेना की कार्रवाई से भारत में उत्साह का माहौल है। 14 फरवरी के आतंकी हमले में वीरगति पाने वाले जवानों के परिजनों की प्रतिक्रिया भी उत्साहजनक है।


जरूरी थे ये कार्रवाई

14 फरवरी 2019 के आतंकी हमले  के बाद भारत सरकार पर बदला लेने का दबाव था। बदला लिया ही जाना चाहिए था। हमले की जिम्मेदारी जैश-ए-मोहम्मद द्वारा लेने के बाद पाकिस्तान को चाहिए था कि वो तत्काल इन आतंकियों पर कार्रवाई करता। लेकिन हमेशा की तरह पाकिस्तानी सरकार ने हमले में पाक स्थित आतंकियों के शामिल होने के सबूत मांगने शुरू कर दिए। ये एक बेशर्मी भरी कूटनीति थी। आख़िर जब पाक स्थित आंतकी संगठन हमले की जिम्मेदारी ले रहा है तो फिर और कितने सबूत चाहिए थे? भारत सरकार समझ चुकी थी कि पाकिस्तान इन आतंकियों पर कार्रवाई नहीं करने वाला। परिणामस्वरूप आज यानी 26 फरवरी 2019 की तड़के आईएएफ ने मिराज -2000 लड़ाकू विमानों से  आतंकियों पर 1000 किलो बम गिराए। बताया जा रहा है कि इस कार्रवाई में 300 से ज्यादा आतंकी मारे गए हैं।


पाकिस्तान की 'ना'

आदत के मुताबिक शुरुआत में पाकिस्तान ने भारतीय वायु सेना के हमले को नकार दिया। पाकिस्तान सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ़ गफूर ने ट्वीट किया। जिसका हिन्दी में अनुवाद कुछ इस तरह है: " भारतीय एयरक्राफ्ट मुजफ्फराबाद सेक्टर में घुसे। पाकिस्तानी एयरफोर्स की समय पर की गई प्रभावी कार्रवाई से बचकर जाते समय वे जल्दबाजी में बालाकोट के पास विस्फोटक पदार्थ गिरा गए। किसी प्रकार के जान-माल का नुक़सान नहीं हुआ।" वैसे पाकिस्तान  में सत्तारूढ़ दल, पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ पार्टी ने भी लगातार कई ट्ववीट कर भारतीय वायु सेना की कार्रवाई का खंडन किया। हालांकि पाकिस्तानी नागरिकों का कुछ और ही कहना है। बीबीसी से बात करते हुए एक शख्स ने बताया कि लगभग तीन बजे बहुत तेज धमाका हुआ। फिर पांच धमाके हुए  और इसके बाद आवाज आनी बंद हो गई।  


पाकिस्तान की धमकी

पाकिस्तान के विदेश मंत्री, शाह महमूद कुरैशी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि भारतीय वायु सेना के नियंत्रण रेखा के उल्लंघन के मद्देनज़र पीएम, इमरान खान की अध्यक्षता में एक विशेष बैठक बुलाई गई थी। बैठक के ब्योरे को पढ़ते हुए कुरैशी ने कहा कि पाकिस्तान अपनी पसंद के समय और स्थान पर भारत के दुस्साहस का जवाब देगा।  कुरैशी ने ये भी कहा कि हेलीकॉप्टर तैयार है। अगर मौसम सही हुआ तो स्थानीय व अंतरराष्ट्रीय मीडिया को उस स्थान पर ले जाया जाएगा जहां भारतीयों द्वारा उल्लंघन हुआ है और भारत के प्रोपेगैंडा की पोल खोलेगा।


भारत दबाव रखे बरकरार

पाकिस्तान चाहे जितनी भी ना नुकर करे लेकिन वहां की आवाम में हलचल मची हुई है। लोग सरकार और सेना से सवाल कर रहे हैं। इन सवालों से बचने के लिए ही पाकिस्तान झूठ बोलता है। भारत को स्प्ष्ट कर देना चाहिए कि पाकिस्तान जब तक मसूद अजहर और हाफिज सईद जैसे आतंकियों पर कार्रवाई नहीं करेगा तब तक इस तरह के हमले जारी रहेंगे। हालांकि पाकिस्तान भी बदले की कार्रवाई कर सकता है। जिसकी संभावना बहुत ज्यादा है। लेकिन उसका जवाब  देने के लिए भारतीय सेना तैयार है। वैसे भी पाकिस्तान जैसा पड़ोसी हो तो हर वक्त तैयार रहना ही पड़ता है।

Monday, February 25, 2019

किसानों के लिए ऐतिहासिक दिन


24 फरवरी 2019 छोटी जोत के किसानों के लिए ऐतिहासिक  साबित हो सकता है। पीएम नरेंद्र मोदी ने  प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना की शुरुआत की है। इस योजना के तहत 2 हेक्टेअर तक की जोत वाले किसानों को हर वर्ष 6 हजार रुपये दिये जाने का प्रावधान है। ये धनराशि किस्तों में दी जानी है। ये योजना 1 जनवरी 2018 से लागू की जा रही है।  फिलहाल 2 हजार रुपये की पहली किस्त जारी हो चुकी है। विपक्षी दल भले ही इस योजना की आलोचना करे लेकिन ये तय है छोटे किसानों के लिहाज से ये एक शानदार कदम है। पिछले साल के 6 हजार रुपये इस साल के 6 हजार रुपयों में जोड़ दिए जाए तो इस साल इन छोटे किसानों को 12 हज़ार रुपया मिलेगा। 12 हजार रुपया कमाने के लिए किसानों को कितनी मेहनत करनी पड़ती हैॆ, जो लोग भी ये जानते हैं वे कभी भी इस योजना की आलोचना नहीं करेंगे।

ऋृणमाफ़ी से ज्यादा कारगर है सीधे वित्तीय सहायता

आम तौर पर राजनीतिक दल किसानों के ऋृण माफ़ करने जैसे कदम उठाते हैं। ऋण माफ़ करने का नुक़सान ये होता है कि केवल उन्हीं किसानों को लाभ मिलता है जिन्होंने ऋण ले रखा है। बचे हुए किसानों को कोई लाभ नहीं मिल पाता। इन किसानों में  अपात्र किसानों संख्या भी बहुत अधिक होती है। अपात्र किसान उन किसानों को कहा जा सकता है जो जानबूझकर ऋृण नहीं देते हैं या जो बड़े किसान होते हैं जिनके पास सभी संसाधन होते हुए भी सरकारी ऋृण नहीं चुकाते।  लेकिन प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना में ऐसा नहीं है। सभी छोटे किसानों को वित्तीय सहायता मिलने से उन्हें राहत जरूर मिलेगी।  


विपक्षी दलों को रास नहीं आई योजना


कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी योजना की आलोचना कर चुके हैं। बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने कल कहा कि गरीब किसानों को 500 रुपये मासिक देना उनका अपमान है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और  पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम का  कहना है कि 2000 रुपये किसानों को घूस दी जा रही है ताकि उनसे वोट लिए जा सकें। विपक्षी नेताओं की आलोचना उम्मीद के मुताबिक है। लिहाजा  इस पर ज्यादा चर्चा की गुंजाइश नहीं बचती है। 

ऐतिहासिक क्यों?

ऐतिहासिक इसलिए है कि आज भले ही 6 हजार की राशि कम लगती हो लेकिन भविष्य में ये राशि बढ़ाई भी जा सकती है। राज्य सरकारें अलग से किसानों के लिए राहत के उपाय कर सकती हैं।  केंद्र और राज्य सरकारों के राहत उपायों की बदौलत  किसानों की स्थिति में निश्चित रूप से सुधार होगा। 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुना करने में मदद मिलेगी। वर्तमान सरकार  किसानों की आय दोगुनी करने की बात कई बार दोहरा चुकी है।
अगर राज्य सरकारों ने भी साथ दिया तो ऐसा कोई कारण नहीं जिसकी वजह से किसानों की आय में वृद्धि न हो सके। 

                                                                                     -वीरेंद्र सिंह
                                                                                     ========


Friday, February 22, 2019

सही नहीं है दोहरा रवैया


पुलवामा हमले के बाद  केंद्र सरकार ने पाकिस्तान के विरुद्ध जो फैसले लिए हैं वे तो पहले भी लिए जा सकते थे। पाकिस्तान को दिया गया मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा हमने पहले ही वापस क्यों नहीं लिया था? केंद्रीय जल संसाधन मंत्री नितिन गडकरी ट्वीटर पर लिख रहे हैं कि भारत सरकार बांध बनाकर और नदियों की धारा पंजाब और जम्मी-कश्मीर की तरफ मोड़कर  अपने हिस्से का पानी रोकेगी। सवाल उठता  है कि अब तक आपने ऐसा क्यों नहीं किया था? पाकिस्तान की हरकतों से हम तंग आ चुके हैं। भारत के विरुद्ध सक्रिय आतंकवादियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई में पाकिस्तान ने कभी ईमानदार कोशिश नहीं की। उल्टे उन्हें बढ़ावा ही दिया है।  उसे दंडित करने के बार-बार धमकी दी जाती है। लेकिन उन धमकियों पर अमल की बात तब होती है जब कोई बड़ा आतंकवादी हमला हो जाता है। जम्मू -कश्मीर को स्पेशल दर्जा देने वाले भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाने की मांग लगातार हो रही है। बीजेपी ने भी कई बार इस मांग को दोहराया है। तो फिर इसे हटाने की कार्रवाई क्यों नहीं होती? भारत सरकार इस अनुच्छेद को हटाने के व्यापक विचार-विमर्श क्यों नहीं शुरू करती? कहीं ऐसा तो नहीं कि अनुच्छेद 370 के मामले में भी बीजेपी पलटी मार रही है। राम मंदिर निर्माण और समान नागरिक संहिता के मुद्दों पर भी बीजेपी कुछ ख़ास नहीं कर सकी है। 

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पुलवामा घटना के बाद देश के कुछ स्थानों से कश्मीरी छात्रों के साथ बदसलूकी या मारपीट के मामलों पर जम्मू एंड कश्मीर के टॉप नेताओं की बयानबाजी काबिले गौर है। ख़ासकर, नैशनल कान्फ्रेंस के नेता और जम्मू एंड कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और  कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आज़ाद और का दोहरा रवैया ही उजागर होता है। उमर अब्दुल्ला का कहना है कि उनके राज्य के छात्रों पर हमला करने वालों को नई दिल्ली का आशीर्वाद प्राप्त है। उमर को  इस बात की पीड़ा है कि पीएम मोदी ने इन छात्रों पर हमले की निंदा नहीं की। वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आज़ाद ने कहा कि ऐसी घटनाएं कश्मीरी छात्रों को दूर करने का काम करेंगी।

उमर अब्दुल्ला साहब और गुलाम नबी आज़ाद जी,  बेकसूर कश्मीरी छात्रों पर हमला वाकई निंदनीय है और कोई भी समझदार भारतीय इसका समर्थन नहीं करेगा। वे भी अपने ही देश के लोग हैं लिहाजा ऐसा नहीं होना चाहिए। लेकिन एक सवाल का जवाब आपको को भी देना चाहिए कि जब कुछ कश्मीरी छात्र आतंकवादियों के समर्थन में हरकतें कर रहे थे तो क्या आपने उन्हें ऐसा नहीं करने की सलाह दी थी?  पूरा देश जब घृणित और  कायराना आतंकी घटना में  देश पर  जान वारने वाले वीरों के बलिदान पर शोक मना रहा था कई जगहों पर बहुत से  कश्मीरी छात्र-छात्राओं ने देश विरोधी और पाकिस्तान के साथ-साथ आतंकवादियों के समर्थन में हरकतें की। कश्मीर में आये दिन भारत विरोधी नारेबाजी होती रहती है। क्यों कभी आपने सख़्ती से ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं की? क्यों आपने कभी दिल से केंद्र सरकार के सुर में सुर नहीं मिलाया? आज जब लोगों का ग़ुस्सा फूट रहा है तो आप को दर्द हो रहा है? सच तो ये है कि आप जैसे नेताओं के पक्षपाती रवैये से जनता तंग आ गई है। इसलिए जब भी आप मुंह खोलते हैं तो आपको विरोध का सामना करना पड़ता है। कोई आपकी सुनने को  तैयार ही नहीं होता। अपनी ऐसी हालत के लिए आप खुद जिम्मेदार हैं। फिलहाल बेहतरल यही होगा कि बयानबाजी करते वक्त संयम से काम लें।

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दिल्ली के मुख्यमंत्री और आआपा के मुखिया अरविंद केजरीवाल इस बात से बेहद हताश और निराश हैं कि कांग्रेस उनसे दिल्ली में गठबंधन करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रही है। बकौल केजरीवाल वो कांग्रेस से गठबंधन को कह-कह कर थक गए हैं। पिछले कुछ समय से वो ये भी दावा कर रहे हैं कि उन्होंने दिल्ली में पिछले चार सालों में जितना काम किया है उतना 70 सालों  में नहीं हुआ। 

अब सवाल उठता है कि जब आपने इतना काम किया है तो आपको दिल्ली की सातों लोकसभा सीटों के जीतने के लिए कांग्रेस का साथ क्यों चाहिए? कांग्रेस के साथ जाने की आपकी ललक आपके उस दावे को कमज़ोर करती है जिसमें आप कहते हैं कि आपने  पिछले 4 सालों में 70 सालों से भी ज्यादा काम किया है। आप और आपके समर्थक ये कह सकते हैं कि मसला लोकसभा चुनावों का है इसलिए कांग्रेस के साथ जाना चाहते हैं। इस स्थिति में आपके विरोधी भी यहीं कहेंगे कि आप तो कांग्रेस को भ्रष्ट्राचार के मुद्दे पर पानी पी-पी कर कोसते थे।अब क्या हुआ जो उसी कांग्रेस के साथ मिलने को आतुर हो? 




Thursday, February 21, 2019

मेगा पोल के दिलचस्प नतीजे!

देश की एक बेहद लोकप्रिय न्यूज वेबसाइट ने 2019 के आम चुनाव के संदर्भ में एक मेगा पोल कराया था। ये पोल 11 फरवरी,2019  से 20 फरवरी 2019 तक चला। ये मेगा पोल  मोदी सरकार के कामकाज, देश का अगला पीएम,  राहुल गांधी की लोकप्रियता और आम चुनाव में राफेल बवाल का असर जैसे मुद्दों को लेकर था। इस पोल में केवल ऑनलाइन लोगों ने भाग लिया था। वेबसाइट का दावा है कि लगभग 2 लाख लॉग-इन यूजर्स की राय को ही इसमें शामिल किया गया है। जाहिर है पोल के नतीजे सभी भारतीय मतदाताओं की मन की बात नहीं है। 21  फरवरी 2019 यानी आज इस पोल के नतीजे सामने आए। इस पोल के नतीजे काफी हद तक चौंकाने वाले भी हैं। 

पोल से साफ़ पता चलता है कि भारत के पीएम नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की लोकप्रियता अभी भी बनी हुई है। लगभाग 84 फीसदी(83.89%) लोग मोदी जी को ही देश के अगले पीएम के रूप में देखना चाहते हैं। केवल 8.33 फीसदी लोगों ने पीएम के रूप में राहुल गांधी को चुना। कांग्रेस के दृष्टिकोण से ये नतीजा बेहद निराशाजनक है।

मोदी सरकार का कार्यकाल लोगों को कैसा लगा?  59.51 % ने  इसे बहुत बढ़िया कहा तो 22.29 प्रतिशत ने बढ़िया बताया। लगभग 8 फीसदी ने औसत तो तकरीबन 10 फीसदी ने इस खराब बताया


महज 24.26 फीसदी लोगों को ही लगता है कि मोदी सरकार में अल्पसंख्यक अपने आप को ज्यादा असुरक्षित महसूस करते हैं। साढ़े 65 फीसदी से भी ज्यादा लोगों को ऐसा नहीं लगता। 10 प्रतिशत से कुछ ज्यादा ने माना कि वे इस विषय पर कुछ नहीं कह सकते।

आगामी लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा क्या होगा?  इसके जवाब में 40 फीसदी से भी ज्यादा ने रोजगार को सबसे बड़ा मुद्दा माना। लगभग 22 फीसदी को किसानों का संकट सबसे बड़ा मुद्दा लगा। 23 फीसदी ने किसी अन्य मुद्दे को सबसे बड़ा मुद्दा माना। केवल 10.16 फीसदी ने राम मंदिर निर्माण को सबसे अहम मसला माना।

क्या राफेल विवाद से एनडीए को लोकसभा चुनाव में नुकसान होगा? लगभग 74 फीसदी से भी ज्यादा लोगों ने नहीं में जवाब दियामहज साढ़े सत्रह फीसदी लोगों ने हां में उत्तर दिया। 

आर्थिक रूप से पिछड़ों को 10 फीसदी आरक्षण का लाभ क्या बीजेपी को मिलेगा ? इस सवाल का जवाब 72 फीसदी से भी ज्यादा ने हां में दिया। 15 %  से कुछ ज्यादा ने ही न में उत्तर दिया।

आम चुनाव के बाद सरकार गठन के लिहाज से कैसी तस्वीर होगी?  इसकी प्रतिक्रिया में 83 प्रतिशत से भी ज्यादा लोगों ने मोदी के नेतृत्व में एनडीए की वापसी की भविष्यवाणी की है। लगभग साढे नौ प्रतिशत ने राहुल के नेतृत्व में गठबंधन सरकार का अनुमान लगाया है। कांग्रेस के नजरिए से ये बात भी कोई उत्साहजनक नहीं है। 

34 प्रतिशत से ज्यादा लोगों ने ग़रीबों के लिए योजनाओं के विस्तार को मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि माना है। तो वहीं 29 फीसदी ने जीएसटी, साढ़े अठारह प्रतिशत से भी ज्यादा ने  स्वच्छ भारत और लगभग 18 फीसदी ने सर्जीकल स्ट्राइक को मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि माना है।

मोदी सरकार की सबसे बड़ी असफलता क्या रही? 35.72 फीसदी लोगों ने  राम मंदिर निर्माण में कोई प्रगति नहीं होना को बताया। लगभग साढ़े 29 प्रतिशत ने रोजगार सृजन न होना को सबसे बड़ी असफलता माना है। साढ़े 13 प्रतिशत ने नोटबंदी को भी मोदी सरकार की विफलता माना ।

एक बेहद दिलचस्प सवाल ये पूछा गया कि 2014 के मुकाबले क्या राहुल गांधी की लोकप्रियता बढ़ी है? 63 प्रतिशत से भी ज्यादा ने ये माना कि  ऐसा नहीं है जबकि 31 फीसदी से भी ज्यादा ने हां में जवाब दिया।लगभग 6 फीसदी कुछ नहीं बता सके। 


ये स्पष्ट है कि ये नतीजे सभी भारतीय मतदाताओं की राय नहीं है।  इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना सही नहीं होगा। लेकिन इतना जरूर है कि  राय जाहिर करने वाले मतदाता  काफी बड़े वर्ग का प्रतिनिधत्व करते होंगे।

                        


Wednesday, February 20, 2019

जब फूट-फूट कर रोए विधायक

आज मैं आपको एक ऐसी घटना के बारे में बताउंगा जो आपकी कुछ धारणाओं को तोड़ देगी।आमतौर पर जब भी किसी विधायक या सांसद का जिक्र होता है तो अनायास ही एक ऐसे आदमी की तस्वीर हमारे जेहन में जाती है जो जनता के पैसे पर मौज करता है। एमएलए और एमपी के बारे में ये भी कहा जाता है कि इनका तो कोई भी काम आसानी से हो जाता है या इन्हें किसी भी तरह की कोई परेशानी नहीं होती और ये तो केवल आम जनता ही है जिसकी कोई नहीं सुनता।  

18 फरवरी 2019 को उप्र विधानसभा में उपस्थित सभी लोग उस समय हैरान रह गए जब सपा विधायक कल्पनाथ पासवान फूट-फूट कर रोने लगे। कल्पनाथ, आज़मगढ के मेहनगर विधानसभा क्षेत्र से समाजवादी पार्टी के विधायक हैं। रोते-रोते कल्पनाथ पासवान ने सदन में  बताया कि वो एक ग़रीब किसान हैं। उन्होंने अपना मकान बनवाने को सात जनवरी को लखनऊ में  बैंक से 10 लाख रुपये निकाले। रुपये लेकर वो रोजवेज की बस से आजमगढ़ पहुंचे और रोडवेज शारदा चौक पर स्थित एक होटल में चाय पीने लगे। तभी उन्हें अहसास हुआ कि उनके बैग से रुपये गायब हैं। अपने रुपये चोरी होने पर कल्पनाथ बेहद परेशान हो गए। जब उन्होंने पुलिस को बताया तो पुलिस ने भी उनकी रिपोर्ट नहीं लिखी जिससे वो बहुत आहत हुए। विधायक ने और भी बहुत कुछ कहा। बक़ौल कल्पनाथ आज मैं रो रहा हूं, कल पूरा सदन रोएगा। कल्पनाथ ने कहा कि मेरे साथ न्याय कीजिए। मुझे न्याय नहीं मिला तो मैं मर जाऊंगा। मैं हाथ जोड़कर विनती करता हूं। मैं कहां जाऊं? मान्यवर मैं जिंदा नहीं रहूंगा। मेरा रुपया दिलवा दीजिए नहीं तो मैं मर जाऊंगा।

क्या समझेअब पता चला कि ऐसा भी होता है। विधायक जीएक आम आदमी की तरह फरियाद कर रहे थे। करीब डेढ़ महीने तक पुलिस ने उनकी रिपोर्ट तक नहीं लिखी। इस घटना से विधायकों-सांसदों के बारे में कुछ ग़लतफहमी ही दूर नहीं होती बल्कि बहुत सारी बातें सामने आती हैं। जैसे, डिजीटल लेन-देन के जमाने में विधायक जी को 10 लाख रुपये निकालने की क्या आवश्यकता थीऔर अगर निकालने ही थे तो ले जाते वक्त सावधानी बरतनी चाहिए थी। ये पता नहीं चल पाया कि विधायक जी अकेले ही रकम ले जा रहे थे या एक-दो विश्वसनीय लोग भी उनके साथ थे।
योगी सरकार की पुलिस की पोल भी खुल गई जिसने लगभग डेढ़ महीने तक एक विधायक की रिपोर्ट नहीं लिखी। हालांकि विधायक के सदन में रोने की घटना के बाद पुलिस ने उनकी रिपोर्ट लिखी। लेकिन ये नाकाफी है। पुलिस ने समय पर कार्रवाई की होती तो अपराधी अब तक पकड़े गए होते और ये नौबत ही नहीं आती।

एक बात और विधायक जी कह रहे थे कि वो एक गरीब किसान हैं। मेरे हिसाब से एक विधायक जिसके पास 10 लाख रुपये हैं उसे अपने आप को ग़रीब नहीं कहना चाहिए। चूंकि उन्होंने अपने आप को किसान बताया है तो उनके पास कुछ जमीन भी होगी। मतलब ये कि विधायक जी को ग़रीब तो नहीं माना जा सकता। हालांकि वो एक शरीफ़ व्यक्ति ज़रूर लगते हैं।

कुलमिलाकर ये पूरा वाकया कुछ धारणाओं का तोड़ता है तो कई सवाल भी खड़े करता है। ये भी एक विडम्बना ही है कि सीधे-सादे लोग विधायक भी बन जाए तो भी उनकी कोई नहीं सुनता!

Tuesday, February 19, 2019

मुसीबतों से क्या घबराना


कभी-कभी सोचता हूं कि हमारी सारी मुसीबतें दूर हो जाए तो क्या होगा? आप सोच रहे होंगे कि फिर तो मजे ही मजे हैं। अरे नहीं भाई! बिना मुसीबतों का जीवन भी कोई जीवन है, मुसीबतें तो भोजन में नमक, मिर्च, घी और अन्य पौष्टिक तत्वों की तरह हैं! जिस भोजन में ये सब न हों वो भोजन किसी काम का नहीं। बेस्वाद और बेकार।इसी  तरह यदि जीवन में थोड़ी बहुत मुसीबतें न हो तो जीने का मजा ही किरकिरा हो जाता है। जीवन बेकार और बेस्वाद हो जाता है। इसलिए जब भी हमारा जीवन ठीक-ठाक पटरी पर दौड़ रहा होता है तो कोई न कोई  मुसीबत टपक ही पड़ती है जीवन को बेकार होने से बचाने के लिए! और अगर न भी आएं तो हम मुसीबतों का हाथ पकड़ कर ले आते हैं या उन्हें न्योता देते हैं कि भई आ जाओ! आपके बिना कुछ अच्छा नहीं लग रहा है!  सच तो ये है कि अगर मुसीबतें न हो तो विकास नाम का शब्द अप्रसांगिक हो जाएगा। अरे भई! जब मुसीबतें ही नहीं होंगी तो उनका समाधान कैसे ढूंढोंगे? और जब समाधान की प्रक्रिया थम जाएगी तो विकास कहां से होगा?


घर में खाली बैठे नौजवान लड़के-लड़कियों को अगर मां-बाप टोकना बंद कर दें, आराम से उनकी ज़रूरतें पूरी करते रहें या उन्हें कभी किसी मुसीबत का सामना न करने दें तो ऐसे लड़के-लड़कियां अपने जीवन में शायद ही कभी कुछ कर पाएं। इसलिए आमतौर पर मां-बाप ऐसा करते नहीं। होता यह है कि जैसे ही मां-बाप को लगने लगता है कि उनके जवान बेटे-बेटियां ज़िम्मेदारी से भाग रहे हैं , कुछ बनने की दिशा में आगे नहीं जा रहे या काम से जी चुरा रहे हैं तो वे उनको टोकते हैं, उन्हें कुछ कर गुजरने की प्रेरणा देते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो वे उन्हें मुसीबतों का सामना करने के लिए तैयार करते हैं क्योंकि आप जब कुछ करेंगे तो मुसीबतें तो आएंगी ही  और बिना मुसीबतों का सामना किए बिना आप कुछ बन नहीं पाओगे।


विश्व की तमाम छोटी- बड़ी कंपनियां अपने यहां उच्च पदों पर लोगों को भर्ती करते समय अनुभवी लोगों को तरजीह देती हैं। वजह साफ है। अनुभवी लोगों ने कई तरह की मुसीबतों को झेला है। ऐसा करते वक्त उन्होंने अमूल्य दक्षता या कौशल हासिल किया है जिसका लाभ ये कंपनियां लेती हैं। उन्हें मुंह-मांगा वेतन देती हैं। उनकी सुख-सुविधाओं का ख्याल रखती हैं।   

कहना यही है कि सारी मुसीबतें ख़त्म होने के सपने देखने का मतलब है कि बेवजह जीने की चाह रखना और मेरा मानना है कि सामान्य समझ रखने वाला कोई भी व्यक्ति बेवजह जीना पसंद नहीं करेगा। 

निष्कर्ष ये निकलता है कि मुसीबतों का स्वागत कीजिए। उनसे निपटते रहिए और जीवन का आनंद लेते हुए आगे बढ़ते रहिए। यही जीवन है!





Monday, February 18, 2019

जानिए कितने भाग्यवान हैं आप

व्यक्ति जब रोज़ सुबह घर से निकलता है तो अपने ईश्वर को ज़रूर याद करता है। करना भी चाहिए। घर वापस भी तो आना होता है। एक बार जब घर से बाहर निकल जाते हैं तो सैकड़ों बातें हमारी जान की दुश्मन बन जाती है।  

बड़े-बड़े शहरों की तो बात ही छोड़ दीजिए, आजकल तो छोटे-छोटे शहरों में भी रोज़ दुर्घटनाएं होती रहती हैं जिनमें कई बार जान तक चली जाती है। शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति हो जो कई बार बाल-बाल न बचा हो। लगभग रोज ही ऐसे अनुभव होते रहते हैं।

दुर्घटना से बचे तो  प्रदूषण आपको बीमार बना देगा। दिल्ली जैसे महानगरों में साल के 11 महीने हवा अत्यधिक ख़तरनाक यानी ज़हरीली होती है। इन शहरों में रहकर भी अगर आप अपना जीवन-यापन सही कर पा रहे हैं तो सही में आपको ऊपरवाले का शुक्रगुजार होना चाहिए।

अगला नंबर है दूषित खानपान का। आजकल शायद ही कोई ऐसा खाद्य पदार्थ हो जिसमें मिलावट न हो। मिलावट भी ऐसे ख़तरनाक पदार्थों की जो पेट में जाते ही अनेक भयंकर बीमारियों को जन्म देते हैं। जीवन भर मिलावट वाला  खाना खाकर  भी अगर आपने  जीवन के 60 बंसत  देख लिए तो क्या अपने आपको भाग्यवान नहीं मानेंगे?

इसके बाद आकस्मिक दुर्घटनाओं का नंबर आता है। बाढ़, बिजली गिरना, सुनामी जैसी  प्राकृतिक आपदाएं भी किसी को नहीं छोड़ती है। 

आपसी दुश्मनी के चलते भी रोज़ सैकड़ों लोग अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। 

आधुनिक जीवन शैली की देन  तनाव व बीपी जैसी बीमारियों के साथ अन्य ख़तरनाक बीमारियों के होते हुए भी अगर आप छोटी-मोटी परेशानी झेलते हुए 70 साल पार गए तो साहआपको तो मोहल्ले भर में मिठाई बांटनी चाहिए।  

इनके अलावा सैकड़ों ऐसी  परेशानियां है कि पूछिए मत। उन सब पर बात करना तक बेहद मुश्किल है। 

अब आपको समझ आ गया होगा कि कितने भाग्यवान हैं आप। इतने सारे जान के दुश्मनों को मात देते हुए आप जीवन व्यतीत कर रहे हैं तो वाकई में ईश्वर का धन्यवाद देना तो बनता ही है। 





                                                                                                      -वीरेंद्र सिंह







Saturday, February 2, 2019

मास्टर स्ट्रोक



मोदी सरकार ने अंतरिम बजट में कई लोकलुभावन घोषणाएं की हैं। उम्मीद के मुताबकि सरकार ने समाज के कमोवेश सभी वर्गों को लुभाने की भरपूर कोशिश की है। आयकर छूट की सीमा पांच लाख होने से नव वेतनभोगी तबका राहत की सांस जरूर लेगा। छोटी जोत के किसानों को सालाना 6000 रुपये सीधे उनके खाते में दिए जाएंगे। सरकार को उम्मीद है कि इससे ग़रीब किसानों के चेहरे पर मुस्कराहट जरूर आएगी। अंतरिम बजट के सभी प्रस्तावों को देखकर आसानी से समझा जा सकता है कि ये बजट  आम चुनाव 2019 को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। 

राहुल के दांव पर भारी अंतरिम बजट

कुछ दिनों पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी न्यूनतम आय की गारंटी का दांव चला था। राहुल गांधी के मुताबिक अगर कांग्रेस सत्ता में आई तो ग़रीबों को न्यूनतम आय दी जाएगी अर्थात  ग़रीबों के खातों में एक निश्चित धनराशि दी जाएगी। अंतरिम बजट के प्रस्तावों के बाद अब राहुल गांधी के न्यूनतम आय वाले दावे पर चर्चा कम हो गई है।


आम चुनाव 2019 पर है नज़र

अंतरिम बजट में हुई लोकलुभावन घोषणाओं के पीछे 2019 में होने वाले आम चुनाव है। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में बीजेपी की हार के पीछे किसानों की नाराज़गी को  बताया जा रहा है।  इसी को ध्यान में रखते हुए छोटी जोत के किसानों को सालाना 6000 रुपये की मदद की घोषणा की गई है। विपक्ष ख़ासकर राहुल भले ही  इसकी आलोचना करे लेकिन तथ्य यही है कि उन्हें डर है कि कहीं किसान मतदाता बीजेपी के पाले में न चला जाए। राहुल का डर  बेवजह नहीं है।


कुलमिलाकर अंतरिम बजट में मोदी सरकार ने अपना मास्टर स्ट्रोक चल दिया है। कांग्रेस को इस मास्टर स्ट्रोक की काट ज़ल्द ही निकालनी होगी क्योंकि अंतरिम बजट के इन प्रस्तावों में 2019 के आम चुनाव में एनडीए की वापसी कराने का दम है।





   

Saturday, April 22, 2017

नहीं चलेगा बहाना गर धरा को है बचाना




२२ अप्रैल को "विश्व पृथ्वी दिवस". के रूप में मनाते हैं. इस दिवस को मनाने का मक़सद लोगों को पृथ्वी पर मंडराते हुए ख़तरे के प्रति चेताना और उस ख़तरे को कम करने के बारे में जागरूक करना है. आज से चार दशक पहले एक अमेरिकी सीनेटर ने पर्यावरण के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए लाखों लोगों के साथ २२ अप्रैल , १९७० को एक विशाल प्रदर्शन किया था. इसी कारण इस दिन को पृथ्वी दिवस के रूप में मान्यता मिल गई. वैसे २१ मार्च को भी संयुक्त राष्ट्र संघ के समर्थन से अंतर्राष्ट्रीय पृथ्वी दिवस मनाया जाता है. जबकि अधिकाँश देशों में २२ अप्रैल को ये दिवस मनाया जाता है.





पृथ्वी पर मंडराते इस संकट का कारण केवल और केवल मनुष्य है. बड़ती हुई जनसँख्या पारिस्थितिकी संकट पैदा कर रही है. प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से पर्यावरण को घातक नुकसान पहुँचा है. ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से लेकर सुनामी जैसे भयानक तूफ़ान के लिए मनुष्य ही ज़िम्मेदार है. आर्कटिक ध्रुब पर 27 ग्लेशियर ही बचे हैं, जबकि 1990 में 150 थे।एक अनुमान के अनुसार बहुत जल्द विश्व की आधी जनसँख्या को पीने का शुद्ध पानी भी नहीं मिलेगा. धरती पर उपलब्ध कुल पानी का ९७% खारा है. ३% से भी कम पानी ताज़ा है जिस में से २.२४% बर्फ़ के रूप में ०.६% धरती के अंदर और बाकी बचा झीलों और नदियों वगैरह में है. इतने पर भी हम न तो पानी की बर्बादी पर ही ध्यान देते हैं और न ही जल संरक्षण के लिए कुछ ठोस उपाय करते हैं. आज दुनिया के करीब एक अरब लोगों को पेयजल नहीं मिलता। 2050 में करीब तीन अरब लोगों को पेयजल नहीं मिलेगा। देश में जल संकट बढ़ेगा। 2050 तक भारत के करीब 60 फीसदी भूजल स्रोत सूख चुके होंगे।



पृथ्वी और उसके पर्यावरण को बचाने के लिए विश्वभर में सभी लोग ज़्यादा से ज़्यादा पेड़ लगाएँ, पॉलीथीन का प्रयोग तुरंत बंद करें. प्राकृतिक संसाधनों और उनसे बने उत्पादों का सोच समझकर उपयोग करें. हम सभी सादगी और संयम से रहते हुए संतुलित खानपान अपनाएँ. पानी की हर बूँद कीमती है ऐसा सोचकर ही पानी का उपयोग करें और पानी को बचाने का हर संभव उपाय करें. इसके साथ-२ सभी देशों की सरकारें भी लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने व बचपन से ही पृकृति प्रेम को बढ़ावा देने के लिए ठोस उपाय करें तो निश्चित ही संसार का सबसे सुन्दर और अनमोल उपहार, हमारी प्यारी धरती माँ , आने वाले करोड़ों वर्षों तक हमें पालती रहेगी.






चलिए हम भी अभी से ये प्रण लें कि ऐसा कोई भी काम नहीं करेंगे जिससे धरती के पर्यावरण को कोई भी हानि हो साथ ही लोगों को स्वच्छ पर्यावरण के लाभ बताने के साथ-२ उनको पर्यावरण को सुरक्षित रखने के तौर-तरीक़े न केवल बताएँगे बल्कि पर्यावरण हितेषी बन अपना उदहारण भी उनके सामने रखेंगे। याद रखना होगा कि गर धरा को है बचाना तो अब नहीं चलेगा कोई बहाना। 

Friday, April 21, 2017

तमिलनाडु के किसानों का मार्मिक प्रदर्शन





दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहें तमिलनाडु के किसानों ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा है। पीएम मोदी तक अपनी बात पहुंचाने के लिए ये किसान अजीब तौर-तरीके अपना रहे हैं। प्रतिकात्मक रूप से कभी इंसानों की खोपड़ियों के कंकाल सामने रखकर बैठ जाते हैं तो कभी घास खाते हैं और कभी चूहें। साड़ी भी पहन लेते हैं। हर दिन अलग-अलग तरीकों से प्रदर्शन किया जाता है। इनके इसी तरह के तरीकों के चलते आम लोगों के साथ-2 मीडिया का ध्यान भी इन किसानों के आंदोलन पर गया है। इनके हालात देखकर किसी का भी दिल पसीज सकता है। उनके प्रति हमदर्दी पैदा हो सकती है। ये किसान पीएम मोदी को जंतर-मंतर पर बुलाना चाहते हैं ताकि अपनी व्यथा पीएम को सुना सकें! उनसे राहत पैकेज जारी करने के लिए राज़ी कर सकें। लेकिन पीएम ने अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है कि वो इन किसानों से मिलने जा सकते हैं।


दिल कहता है कि अगर पीएम मोदी इन किसानों से मिल लें तो एक बहुत अच्छा संदेश जाएगा। लेकिन दिल के साथ-साथ थोड़ा दिमाग़ लगाने में कोई हर्ज नहीं है। ख़बर है कि करीब 37 दिन से ये किसान आंदोलनरत हैं। इस दौरान ये किसान अरुण जेटली, राजनाथ सिंह, उमा भारती और राधा मोहन सिंह जैसे नेताओं से मिल चुके हैं। मद्रास हाईकोर्ट और राज्य सरकार के आदेश के बाद कोऑपरेटिव बैंकों ने इनका कर्जा पहले ही ख़ारिज कर दिया है। अब इन किसानों की मांग है कि केंद्र सरकार इन्हें नये सिरे से राहत पैकेज जारी करे क्योंकि सूखे से इनकी फसल बर्बाद हो चुकी है और अब नई फसल के लिए इनके पैसे नहीं है। बाकी लोन(शायद दूसरे बैंकों से लिया गया) माफ़ करें। किसानों की मांग से कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन तथ्य ये है कि देशभर के किसान इसी तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं। आज तमिलनाडु के किसान पीएम से मिलने की जिद पर अड़े हैं। इनकी मांगे मान ली गई तो महाराष्ट्र और दूसरे प्रदेशों के किसान भी इसी तरह की जिद कर सकते हैं। सवाल ये है कि क्या भारत सरकार का वित्त मंत्रालय इस हालात में है कि वो सारे देश के किसानों के लिए राहत पैकेज जारी कर सकता है? अगर ऐसा होता तो पीएम मोदी अब तक इन किसानों से मिल लिए होते! होना तो ये चाहिए कि किसानों को पहले अपनी राज्य सरकार पर दबाव डालना चाहिए। राज्य सरकारों का भी ये फर्ज है कि अपने-अपने प्रदेश के किसानों की समस्याओं के समाधान को लेकर टाल-मटोल वाला रवैया न रखें। तमिलानाडु सरकार को अपने स्तर पर और भी ज्यादा प्रयास करने चाहिए थे ताकि इन किसानों को जंतर-मंतर पर आकर प्रदर्शन करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। हालांकि किसानों की मांग जायज लगती है लेकिन पीएम मोदी द्वारा प्रदर्शनकारी किसानों से नहीं मिलने की भी ठोस वजहें हैं। अब ये देखना दिलचस्प होगा कि केंद्र सरकार इन किसानों के आंदोलन के प्रति कैसा रूख अख़्तियार करती है।

Thursday, December 8, 2016

ज़रूरी है शब्दों के चयन में सतर्कता

एक ज़िम्मेदार नागरिक और एक ज़िम्मेदार पत्रकार में क्या अंतर हो सकता है? हर नागरिक से अपेक्षा रहती है कि वो हर संभव एक बेहतर नागरिक बने। संविधान प्रदत्त अधिकारों के साथ- साथ अपने कर्तव्यों के प्रति भी सजग रहे। अपने जीवन में नित नई ऊंचाइयों को प्राप्त कर अपना और अपने देश का मान-सम्मान बढ़ाये। दूसरे नागरिकों के प्रति न केवल संवेदनशील बने बल्कि उनके अधिकारों का सम्मान भी करे। जरूरत पड़ने पर उनकी मदद करे और सभी के प्रति दयाभाव रखे। किसी भी तरह के जातिवाद व संप्रदायवाद से दूर रहे। ईमानदार व सतयनिष्ठ हो। आपसी भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए प्रयत्नशील रहे। अपने देश के संविधान में दिए गए प्रावधानों के अनुसार व्यवहार करे इत्यादि-इत्यादि! अगर किसी भी नागरिक में ये गुण हैं तो स्वाभाविक तौर पर वो नागरिक एक ज़िम्मेदार नागरिक माना जाएगा। एक जिम्मेदार नागरिक को अच्छा इंसान भी होना चाहिए। 

दूसरी तरफ़ एक पत्रकार की भूमिका काफ़ी चुनौतिपूर्ण होती है और केवल एक ज़िम्मेदार पत्रकार ही उस भूमिका के साथ न्याय कर सकता है। पत्रकार में एक ज़िम्मेदार नागरिक के सभी गुण होने चाहिए। हर पत्रकार से अपेक्षा रहती है कि वो उन तथ्यों से अवगत रहे जिनसे सामान्य नागरिक आम तौर पर अनभिज्ञ होते हैं। पत्रकार सच तलाशने वाला होता है। एक अच्छा पत्रकार संवेदनशीनल, ईमानदार व सत्यनिष्ठ होता है। पत्रकार से तटस्थ व निष्पक्ष होने की अपेक्षा की जाती है ताकि उसकी विश्वसनीयता बनी रहे। बिना विश्वसनीयता के पत्रकार की कल्पना करना भी मूर्खता है। पत्रकार को अपने विचारों से ज़्यादा तथ्यों को महत्व देना होता है। पत्रकार को हर तरह के जातिवाद, संप्रदायवाद और भेदभाव से दूर रहना होता है। पत्रकार से अपने शब्दों का चयन करते वक्त अत्यधिक सतर्कता बरतने की उम्मीद होती है ताकि उलझन पैदा न हो। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो एक पत्रकार की ज़िम्मेदारी एक नागरिक की ज़िम्मेदारी कहीं ज्यादा होती है।

पत्रकार अपनी ज़िम्मेदारी को सही ढंग से नहीं निभाता तो इसका परिणाम देश और समाज के साथ-साथ उसे स्वयं को भी भुगतना पड़ता है। उसकी विश्वसनीयता चली जाती है जिसके बाद वो पत्रकार, पत्रकार नहीं रहता!

सवाल उठता है कि  क्या आज की पत्रकारिता में इन आदर्शों को जिया जा रहा है? क्या पत्रकार ये ध्यान रखते हैं कि वे जो कह रहे हैं  वो पत्रकारिता के आदर्शों के ख़िलाफ़ तो नहीं है? 24/7 के दौर की पत्रकारिता में कई बार ऐसा लगता है कि कहीं कुछ कमी सी है। पत्रकारिता के आदर्श कहीं खो से गए लगते हैं। पुरज़ोर तरीके से अपनी बात रखने की चाह में शब्दों के चयन में सतर्कता दिखाई नहीं पड़ती। बात को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जा रह है। विशेषणों का अनावश्यक प्रयोग तमगे  बांटने में किया जा रहा है। इससे कहीं न कहीं पत्रकारों की विश्वसनीयता पर संकट मंडराने लगा है।


टीवी पत्रकारिता में रवीश कुमार एक बड़ा नाम है। उनकी अपनी एक इमेज है। उनके समर्थक उनकी साहसिक पत्रकारिता की तारीफ़ करते नहीं थकते। 5दिसंबर 2016, शाम 9 बजे रवीश कुमार ने एनडीटीवी पर प्राइम टाइम कार्यक्रम में उस वक्त अस्तपताल में मौत से जूझ रही जयललिता के रोते-बिलखते समर्थकों के संदर्भ में उत्तर भारत के कथित भक्तों के बारे में जिन शब्दों का प्रयोग किया है। उन शब्दों पर गौर करिए..।  

उत्तर भारत के लोग भक्त के बारे में जानते हैं! ‘भक्त उत्तर भारत की राजनीति का वो नया तत्व है जिसका नाम तो भक्त है मगर संस्कार भक्त के नहीं है। उसकी भाषा गालियों की है। अंध समर्थन की है। मारने पीटने की है। मूर्खता की है। भक्त होना सियासत में नेता का बाहुबली  बनना हो गया है। गुंडे का नया नाम है।


इन पंक्तियों में उलझन है। भक्त है लेकिन उसमें भक्त वाले संस्कार नहीं हैं तो फिर भक्त कैसे माना जा सकता है? अंध समर्थन के मापदंड कौन से हैं? कहते हैं कि गुंडे का नया नाम है। गुंडे को नया नाम देने की जरूरत क्यों पड़ गई? अगर गुंडा है तो फिर गुंडा ही रहने दीजिए न। गाली देना वाला भी भक्त नहीं होता! जबकि इस परिभाषा के अनुसार किसी भी सरकार या नेता का कोई भी अंध समर्थक जो गाली देता है, मारने पीटने को लेकर आमादा है, मूर्ख है, वो भक्त है!


किसी सरकार या किसी नेता के समर्थकों की ऐसी मनमानी व्याख्या पत्रकारिता के आदर्शों के अनुरूप है या नहीं इस पर बहस की गुंजाइश बनती है। इसमें संवेदनशीलता का अभाव झलकता है जबकि संवेदनशीलता पत्रकारिता का अहम तत्व है। अनावश्यक विशेषणों का प्रयोग किया गया लगता है जिनके चलते भ्रम की स्थिति नज़र आती है। आप ये भी कह सकते हैं कि पत्रकार महोदय ने शब्द चयन को लेकर थोड़ी और सावधानी बरती होती तो अच्छा रहता। पत्रकारिता की विश्वसनीयता बनाए रखने की ज़िम्मेदारी पत्रकारों के कंधों पर है लिहाजा उस ज़िम्मेदारी को उठाने में कोताही नहीं बरती जानी चाहिए।  मनमानी मत करिए। पत्रकार अपनी ज़िम्मेदारी को जितनी शिद्दत से निभाएंगे पत्रकारिता और पत्रकारों में जनता का विश्वास उतना ही गहरा होता जाएगा। 

Sunday, December 4, 2016

संसद में बज रहे ढोल की पोल

 संसद के शीतकालीन सत्र में गतिरोध जारी है। 13 दिन गुजर गए लेकिन काम-धंधा शुरू होने की कोई ख़ुशखबरी अभी तक नहीं मिली है। मलाल तो हो रहा होगा लेकिन कोई बात नहीं! संसद के सत्र तो आगे भी आते रहेंगे। काम-धाम की तब देखी जाएगी। इसलिए हैरान-परेशान होने की जरूरत नही है! बस नज़रिया बदलने की जरूरत है! संसद में हो रहे हंगामे को हंगामा कतई नहीं समझा जाना चाहिए! इसे ढोल बजाना कहते हैं! 

ये ढोल विपक्ष बजा रहा है! इस ढोल की आवाज सनिए! ये ढोल इसलिए बजाया जाता है ताकि जनता जान सके कि अगर बैंक के सामने खड़े-खड़े जनता परेशान है तो संसद में उनके नेता भी कोई चैन से नहीं बैठे हैं। हंगामा, नारेबाज़ी, धरना प्रदर्शन इत्यादि-इत्यादि कितना कुछ करना पड़ता है। अपने कुछ बंदों को नियमित रूप से टीवी पर भेजना पड़ता है ताकि जनता को बताया जा सके कि ढोल उन्होंने ही बजाया था। ताकि जाना जा सके कि ढोल की आवाज जनता ने सुनी कि नहीं सुनी!  ये समझाया जा सके कि ढोल बजाना कितना जरूरी था। ढोल बजाने में किन-किन दलों और नेताओं ने साथ दिया! जो नेता सहयोग करने की बजाए कानों में उंगली डाल कर सत्ता पक्ष की साइड हो लिए उनको लताड़ना पड़ता है!

जनता को समझाना होता है कि आपको और हमें यानि प्रतिपक्ष को परेशान करने वाला दुश्मन एक ही है। लिहाजा आप हमारे साथ आ जाये। जिसने हमें परेशान किया है उसे सबक सिखाने के लिए जनता का हमारे साथ आना बहुत जरूरी है! मतलब अब गेंद जनता यानि आपके पाले में है। अब आप सोच रहे होंगे कि आप गेंद का क्या करेंगे! जिस गेंद का इस्तेमाल काफी बाद में होना हो उस गेंद की अभी क्या जरूरत!  आपकी बात में दम है लेकिन निराश होने की जरूरत नहीं है। मैं फिर कहूंगा कि आप नज़रिया बदलो। ढोल बजाने वाले नेताओं की योग्यता और क्षमता पर भरोसा  बनाए रखो। अपनी परेशानियां उनके हवाले कर दो। वे आपकी परेशानियों का सही इस्तेमाल करेंगे! आपकी परेशानियों को सीढ़ी बनाकर टॉप पर पहुंचेंगे! आपकी परेशानियों का इससे अच्छा उपयोग नहीं हो सकता है!

आप इसे इस तरह भी समझ सकते कि संसद भले ही नहीं चल रही हो लेकिन बाकी तो सब चल रहा है! और जो चल रहा है वो भी कम अभूतपूर्व नहीं है! इसे समझना पड़ेगा! जरा सोचिए! संसद चलने से देश का भला हो जाता और सत्ता पक्ष की धाक जम जाती! लेकिन प्रतिपक्ष को सांत्वना पुरस्कार के अलावा कुछ हासिल नहीं होता! अब भला इस बात को कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है! जब संसद चलने के लिए पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों ही बराबर के जिम्मेदार होते हैं तो फायदा भी तो दोनों को बराबर ही होना चाहिए न! मतलब महज संसद चलने से ही तो काम नहीं चलने वाला है न। इसलिए संसद चलने से जरूरी है सबकी राजनीति चले। लिहाजा राजनीति चल रही है। राहुल गांधी भी चल निकले हैं! राहुल का चलना कितना जरूरी था ये आप कांग्रेस से पूछ सकते हैं! वैसे क्या वाकई पूछने की जरूरत है?  


    





Monday, November 28, 2016

नोटबंदी पर ग़ैर-जिम्मेदारी

पीएम मोदी ने आकाशवाणी के ज़रिए एक बार फिर से अपने मन की बातरखी तो ये जानकर अच्छा लगा कि मोदी जी विमुद्रीकरण यानि नोटबंदी के चलते नागरिकों को हो रही कठिनाईयों से अवगत हैं। होना भी चाहिए। एक विशाल जनसंख्या वाले देश में नोटबंदी जैसे फैसले के असर की जानकारी पीएम को हर हाल में होनी ही चाहिए ताकि ज़रूरत पड़ने पर उचित कदम उठाए जा सके। विमुद्रीकरण में सामने आए अच्छे और सुखद अनुभवों को साझा करना बहुतों को पसंद आया होगा जैसे कि सूरत में महज 500 रुपये में शादी संपन्न हो जाने की चर्चा। लेकिन नोटबंदी के चलते जो दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं सामने आई हैं अगर उन घटनाओं का ज़िक्र भी पीएम ने अपने संबोधन में कर दिया होता तो उसकी सराहना भी हर कोई करता! पीड़ित लोगों के जख़्मों पर मोदी जी ने सहानुभूति का मरहम लगा दिया होता उनका मन भी हलका हो जाता! ऐसा करने से न केवल सरकार की छवि बेहतर होने में मदद मिलती बल्कि पीड़ितों को भी दिलासा मिलता। लेकिन मोदी जी ने ऐसा नहीं किया।

पीएम कहते हैं कि नोटबंदी को भरपूर समर्थन मिल रहा है और देश की जनता अच्छे भारत के निर्माण में कष्ट सहकर भी सरकार के साथ है तो ये पूरा सच नहीं है। ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है जो नोटबंदी की पूरी कवायद पर ही सवाल खड़ा करते हैं। सवाल उठाने वाले सभी विपक्षी दलों के समर्थक हों ऐसा भी नहीं है। हां इनमें ऐसं बहुत से लोग हैं जो चाहकर भी नोटबंदी से होने वाली दिक्कतों को अनदेखा नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे ग़रीबों की संख्या भी कम नहीं है जिन्हें नोटबंदी के चलते बेहद कष्ट झेलने पड़ रहे हैं। भूखे रहने को मजबूर होना पड़ा है या पड़ रहा है। एटीएम के सामने लगी लंबी-लंबी कतारें अभी भी कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। कई जगह कैश की दिक्कत अभी तक बनी हुई है। ऐसी ख़बरें भी सामने आई हैं कि बेटी की शादी में बैंक से कैश नहीं मिलने पर उसके पिता ने आत्महत्या की है और ये भी किसी से छिपा नहीं है कि नोट बदलने के चलते कई लोगों की मौत हुई है।  मन की बात कार्यक्रम में अगर पीएम ने इनके प्रति भी अपनी संवेदना जताई होती तो इससे जनता के बीच उनके संवेदनशील पीएम होने का संदेश जाता।     

ये विडंबना भी देखिए कि अगर सरकार को नोटबंदी के चलते हो रही मुश्किलें नज़र नहीं आ रही हैं तो विपक्ष और सरकार के आलोचकों को इसमें कुछ भी अच्छा नज़र नहीं आ रहा है। यानि दोनों ही पक्ष नोटबंदी के बाद उपजे हालातों की सही तस्वीर को न सामने रखना चाहते हैं और न ही बात करना चाहते हैं। जब विपक्ष कहता है कि नोटबंदी से जनता त्राहिमाम कर रही है और इसका कोई लाभ देश को नहीं होने जा रहा है तो ये भी पूरी तरह सच नहीं है क्योंकि इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि देश में बड़ा वर्ग नोटबंदी का स्वागत कर रहा है। इस वर्ग का लगता है कि नोटबंदी से काले धन, नकली नोटों और आतंकवादियों के वित्तीय स्रोतों पर करारा प्रहार हुआ है। बड़ी मात्रा में कैश पकड़े जाने की अब तक कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। ये सब काला धन ही था। ये अनुमान लगाया जा रहा है कि कि आतंकवादियों पर भी नोटबंदी का खासा असर हुआ है। यानि नोटबंदी से कुछ हद तक इच्छित परिणाम भी सामने आ रह हैं। लेकिन विपक्ष और आलोचक इसे स्वीकारने के मूड में नहीं हैं जिसके चलते संसद के शीतकालीन सत्र में अब तक कोई काम नहीं हो सका है।  सही तस्वीर को जनता के सामने नहीं रखने के लिए विपक्ष को ग़ैर-ज़िम्मेदार क्यों न समझा जाए?  

जहां तक कैशलेस सोसायटी के निर्माण की बात है तो ऐसा लगता है कि मोदी जी उन लोगों को दौड़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं जिनमें बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो तेज चलने में भी सक्षम नहीं हैं। मतलब ये है कि कैशलेस सोसायटी बनने में व्यवहारिक दिक्कतें हैं। हालांकि इसका मतलब ये नहीं कि प्रयास ही न किया जाए। लिहाजा कैशलेस सोसायटी के लिए सरकार की पहल तो अच्छी है लेकिन धैर्य रखना होगा। इसमें वक्त लगेगा। सरकार को ज़ल्दबाज़ी से बचना चाहिए। फिलहाल तो कैश की कमी से जूझ रहे लोगों को राहत पहुंचाने के उपाय होने चाहिए।




Saturday, November 26, 2016

सबको बाइज्ज़त बरी करने वाली 'अदालत'!


पीएम मोदी के 'रोने' पर मायावती जी  ने चुटकी ले है। वैसे इरादा जान लेने का था!

'मेक इन इंडिया' में बहुत से लोग अपना योगदान कुछ इस तरह से भी दे रहे हैं कि वे जिसे चाहते हैं उसे 'भक्त' बना देते हैं!

वो जमाना गया जब 60-70 साल की ज़िंदगी भी इंसान को काफी लगती थी। आजकल तो इतने साल फेसबुक और व्हाट्स अप पर वी़डियो देखने में ही निकल जाते हैं।

ठहाके लगाने के लिए चुटकुले पढ़ना कतई जरूरी नहीं है। आप चाहें तो केजरीवाल जी 
के ट्वीट भी पढ़ सकते हैं।

एक हिसाब से मोदी जी कुछ भी न करे तो भी चलेगा क्योंकि 'भक्त' तब भी उनकी प्रशंसा ही करेंगे और विरोधी तो करने पर भी यही कहते हैं कि पीएम कुछ नहीं करते!

इंसानों की ज़हर उगलने की क़ाबिलियत को देखते हुए ज़हर उगलने वाले बाकी जीवों को स्वेच्छा से विलुप्त हो जाना चाहिए!

'स्वच्छ भारत अभियान' की तरह ही 'स्वस्थ खानपान अभियान' भी बेहद जरूरी है! हर नुक्कड़ पर मिलने वाली दूषित भोजन सामाग्री व ग़लत खानपान की आदतें भी पाकिस्तान जितनी ही ख़तरनाक हैं!

प्रधानमंत्री आवास वाली रेस कोर्स रोड का नया नाम 'लोक कल्याण मार्ग' है। नये नाम से ऐसी फील आती है जैसे ये नाम "कांग्रेस कल्याण मार्ग" से प्रेरित हो!

जब घमंड आ जाता है तो बाकी चीजें आना स्वत: ही बंद हो जाती हैं!

एक महीने की वैधता के साथ 100-200 एमबी डेटा देना ऐसा ही है जैसे किसी बच्चे को बिस्किट का एक पैकिट देकर कह दिया जाए कि जाओ बेटा महीने भर इसी से काम चलाओ!

"दुनिया की कोई ताकत हमसे कश्मीर नहीं छीन सकती", चंद शब्दों का ये डायलॉग पाकिस्तानियों के लिए 'मिर्ची बम' का काम करता है।

लोग नाहक ही राजनीति को बदनाम करते हैं। ये तो वो पेशा जिसमें बंदा आख़िरी सांस तक भी पीएम-सीएम बनने के चांस रखता है!

एक के बाद एक बड़ा विवाद पैदा करना ऐसा ही है जैसे देश के विकास की राह में पाकिस्तान छोड़ दिया हो!

एक समय था जब बिहार के भाईयों को काम-धंधे की तलाश में दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ता था। आज समय बदल गया है अब शराब के लिए करना पड़ता है!

भारत इकलौता ऐसा देश है जहां बड़ीं संख्या में ऐसे लोग रहते हैं जो स्वयं तो बेवकूफ बन जाते हैं लेकिन बेवकूफ बनाने वाले को हीरो बना देते हैं!

कहा जा रहा है कि इकॉनमी की सुधार की रफ्तार धीमी पड़ गई है! इसका कुछ श्रेय उन लोगों को भी दिया जाना चाहिए जो संसद नहीं चलने देते!

रजत शर्मा जी की 'आप की अदालत' एकमात्र ऐसी अदालत है जहां मुकदमा किसी पर भी चले उसका बाइज्जत बरी होना तय है!

स्मार्टफोन की कीमत पचास हजार भी हो, तब भी प्रचार करने वाला उसे 'सस्ता' बताकर, मेरे जैसों को ग़रीब होने का अहसास करा ही देता है!


कितनी दिलचस्प बात है कि सुबह से लेकर शाम तक कई मर्तबा बेवकूफ बनने के बाद भी इंसान अपने आप को ही सबसे ज्यादा अक्लमंद समझता है!